साहित्य

देखता रहता था -वह

शशि कांत श्रीवास्तव

मानव मन के एकाकीपन की व्यथा को दर्शाती हुई रचना…,

देखता रहता था, वह एकटक सदा
निर्विकार –भाव से
शून्य में….
विरह की वेदना के शूल
चुभते रहे —सदा
हिय में —उसके
पर…
रो नहीं सकता –वह
क्योंकि, मानव है
दर्द को पीता रहा –सदा
चुपचाप…
सहता रहा –और
रोता रहा -मन ही मन
जलता रहा, —और
छटपटाता रहा,
अन्तर्मन की तड़प को, छिपाता रहा
पर…. वह,
छलक आती थी –कभी कभी
चेहरे पर,
अश्रु बूंदों के रूप मे
आँखों की कोरों पर
देखता रहता वह, एकटक सदा,
संध्या –वेला,
आंखें खुली थी –उनकी
एक चमक थी –उसमें
मिलन की –उनसे
जा मिली वह, एक पल में
सब कुछ छोड़कर,
उस पार —शून्य में
देखता रहता था वह, एकटक सदा,
शून्य में….. ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली -पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना

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