
वीणा वादिनी हे कल्याणी, काव्य जगत की दाती हो,
कंठ में मेरे सुरों की तान, तुम भी तो बजवाती हो।
पुष्प चढ़ाऊ चरण आपके, चरणों में धर करके शीश,
तुमसे कर जोड़ प्रार्थना, हमको दो मां अथाह आशीष।
गूंगे से तुम राग गवादो, बेसुर को तुम देती ताल,
सफेद कमल आसन बिछा के,विद्या धन से करते मालामाल।
जब गूंजी हुई वीणा झंकार, गूंज उठा सारा “आकाश”
यश कीर्ति तुमसे मिलती, मां तुम पर पूरा विश्वास।
पंडित मुल्क राज “आकाश”




