
मेरी दृष्टि
वहां तक जाती है
उन बस्तियों तक
जिन बस्तियों में
झेलता गरीब का तन
विवशता से लड़ता
लाचारी का दूध पी रहा है
पूरा कुनबा
सिर्फ वहां रहती है
एक रोटी की तलाश
क्षुधा शान्त करने की
सुबह से शाम तक
तरकीब निकाली जाती है
अगले दिन का
जिनके पास
कोई भविष्य नहीं होता है
एक जहां अनवरत
संघर्ष का दौर होता है
…..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ…
जयचंद प्रजापति ‘जय’ की यह कविता “मेरी दृष्टि” गरीबी और सामाजिक विपन्नता की मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है। कवि की दृष्टि उन परित्यक्त बस्तियों तक पहुँचती है जहाँ गरीब का तन विवशता से जूझता रहता है, लाचारी का दूध पीकर पूरा कुनबा पलता है, और एक रोटी की तलाश ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाता है।
सुबह से शाम तक क्षुधा शांत करने की तरकीबें निकाली जाती हैं, जबकि अगले दिन का कोई भविष्य नजर नहीं आता—वहाँ अनवरत संघर्ष का दौर चलता रहता है। प्रयागराज के इस कवि ने सरल लेकिन गहन भाषा में गरीब की दयनीय स्थिति को उकेरा है, जो सामाजिक असमानता पर करारा व्यंग्य और करुणा का भाव जगाता है।
इस कविता में ‘जय’ की व्यंग्यात्मक शैली झलकती है, जहाँ रोजमर्रा की भाषा जैसे “लाचारी का दूध पी रहा है” से गरीबी की पीढ़ीगत गहराई व्यक्त होती है।



