
मेरी कवितायें
आह से निकलती हैं
खोखलापन नहीं
कोई राग द्वेष नहीं
सीधे सरल लिबास में
मधुर भावना लिये
कोमल कहानी जैसे
एक सोंधी महक सी
चांदनी रात सी
एक धवल वसन की तरह
कोई आवरण नहीं
खुले दरवाजे की तरह
होती हैं मेरी कवितायें
बिल्कुल निडर योध्दा तरह
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ
कवि कहता है कि उसकी कविताएँ किसी कृत्रिम प्रयास से नहीं, बल्कि उसकी आहों से, उसके अंतर के दुख–सुख, पीड़ा और संवेदना से जन्म लेती हैं।
उनमें खोखलापन या बनावटीपन नहीं है, न ही किसी के प्रति राग–द्वेष, ईर्ष्या या विद्वेष की भावना है। वे सीधे, सरल और सादे लिबास में रहती हैं, यानी भाषा और शैली सहज है, सजावटी नहीं; पर उस सादगी के भीतर मधुर भावनाएँ, कोमल संवेदनाएँ भरी हुई हैं।
उसकी कविताएँ एक कोमल कहानी की तरह हैं, जिन्हें पढ़ते–सुनते हुए मन में मिट्टी की सोंधी महक सी ताज़गी और अपनापन महसूस होता है। वे चाँदनी रात की तरह निर्मल, शीतल और उजली हैं, जैसे एक धवल (सफ़ेद) वस्त्र – जिसमें कोई दाग, छल या कपट न हो।
कवि कहता है कि उसकी कविताओं पर कोई आवरण नहीं है, वे किसी पर्दे, बनावट या दंभ के पीछे छिपी नहीं, बल्कि खुले दरवाजे की तरह हैं; जो भी पाठक आए, वह उन्हें सहजता से देख–समझ सके।
अंत में वह अपनी कविताओं को निडर योद्धा की तरह बताता है। अर्थात उसकी रचनाएँ सच्चाई से पीछे नहीं हटतीं, निर्भीक होकर बात कहती हैं, किसी भय, दबाव या झिझक में नहीं फँसतीं।
कुल मिलाकर, कविता का भाव यह है कि कवि की कविताएँ सहज, निष्कपट, भावपूर्ण, सादगी और पवित्रता से भरी हुई, और साथ ही सत्य के पक्ष में निडर होकर खड़ी रहने वाली हैं




