
दो गोलार्धों में बँटा है यह सम्पूर्ण संसार,
उत्तर गोलार्ध में भारत है,संस्कृति का विस्तार।
सूर्य उपासना का पर्व, पावन यह दिन महान,
मकर संक्रांति कहलाता, करता जग का कल्याण।
बारह राशियों में भ्रमण करे सूर्य, धरकर बारह रूप
संक्रांति कहलाए तब, बदले जब उसके स्वरूप।
मकर राशि में प्रवेश,जब करते दिनकर देव,
उत्तरायण की बेला आती, मिटते तम के भेद।
सब संक्रांतियों में श्रेष्ठ है, यह पावन त्योहार,
महाभारत के प्रसंग से प्रमाणिक यह त्योहार।
भीष्म पितामह बाण शय्या पर, आहत थे,
उत्तरायण की प्रतीक्षा में, प्राण त्यागने को तत्पर थे।
इस दिन स्नान और दान का, माना गया विधान,
सूर्योपासना से जीवन में सबके भरता है नव प्राण।
दिन बड़े होने लगते हैं, घटती शीत की छाया,
धूप की विजय यात्रा ने, जीवन में उजास लाया।
कहीं खिचड़ी, कहीं पोंगल, कहीं बीहू की धूमधाम,
हर प्रदेश में रूप है अलग लेकिन भाव वही समान।
तिल-गुड़ की मधुरता संग, पतंगों का उल्लास,
मकर संक्रांति जोड़ती बनकर एक विश्वास।
एकता के सूत्र में बाँधे, भारत के हर जन को,
सूर्योपासना पर्व का मंगलमय हर क्षण हो।
सुमन बिष्ट, नोएडा




