
उपकार में जब अपकार हुआ ,
सत्कार में जब दुत्कार हुआ ।
हुआ अंत जब सहनशक्ति का ,
हृदय का तब चीत्कार हुआ ।।
चला खंजर ये सहनशक्ति पर ,
खंजर सीधे उस पार हुआ ।
चीख उठा तब अंतरात्मा यह ,
तो परमात्मा का पुकार हुआ ।।
दौड़े आए परमात्मा भी सीधे ,
मानवता अब शर्मसार हुआ ।
सह न सके परमात्मा इसको ,
बिन शस्त्र ही तेज धार हुआ ।।
बन गया जिंदा लाश वह अब ,
बिन अस्त्र ऐसा ये मार हुआ ।
न झगड़ा न ही लड़ाई कहीं पे ,
नहीं कहीं कोई ये रार हुआ ।।
किनारे किनारे रह गए दोनों ,
नहीं कोई भी मजधार हुआ ।
उतरा न्याय एक बार धरा पर ,
मानवता का ही उद्गार हुआ ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा (सारण )
बिहार



