साहित्य

अधिकार नहीं

प्रिया काम्बोज प्रिया

कोख में ही मार दोगे
क्या मुझे जीने का अधिकार नहीं
घर से बाहर ना निकलूं मैं
क्या बाहर जाने का अधिकार नहीं
पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहती हूं
क्या इतना भी अधिकार नहीं
खुले आसमां में उड़ जाऊं मैं
क्या सपनों पूर भी अधिकार नहीं
देर रात ना रहो घर से बाहर
क्या काम से जाने का अधिकार नहीं
बेटी हुई है घर किस्मत साथ में लाती हूं
क्या आपने हिस्से की जिंदगी का अधिकार नहीं
बचपन से सुना दूसरे घर जाना है
क्या इस घर पर मेरा अधिकार नहीं
दूसरे घर जा सुनती रहती अपने घर से क्या लाई
क्या यहां भी कोई अधिकार नहीं
इसकी बहन ,इसकी बेटी ,उसकी पत्नी,उसकी मां
क्या मेरे नाम पर भी अपना अधिकार नहीं
क्यों जी रही हूं मैं बस दूसरों की खातिर मर रही हूं मैं
क्या खुद की मर्जी से जीने का अधिकार नहीं
हां बताओ ना क्या मेरा इतना भी अधिकार नहीं

प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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