
मोबाइल ने दुनिया मेरी, मुट्ठी में भर दी।
मोबाइल ने पर चिट्ठी की, छुट्टी कर दी।।
मोबाइल ने रंगमंच को, भी समझाया।
लेकिन रील पर खूब, नंगा नाच दिखाया।।
दूर दूर रहकर भी, आमने- सामने बात कराता।
लेकिन घर में सबको ये, अजनबी कर जाता।।
खेल -कूद और कामिक्स को, डस लिया इसने ।
बच्चों के हंसते बचपन को, खाया इसने।।
एक दूजे को खूब मिलाया, सैकेडो में ।
बंधे बंधाए घर को टूटवाया, मिनटों में ।।
चीज सही थी पर गलत, उपयोग हुआ है।
मोबाइल बनता जा रहा, मौत का कुआं है ।।
घने अकेले पन का ये, सच्चा साथी है।
खर्चे खूब बढ़ाने वाला, मखना हाथी है।।
संस्कार और संस्कृति का, देश था अपना।
तोड़ दिया है इसने जैसे, अब हर सपना ।।
सुविधाओं के नाम, बना ये बस बीमारी ।
बात सुनेगा कौन मगर, अब यहां हमारी।।
अखबार, घड़ी, किताबें, इसने डस ली।
घर में अपनों की किलकारी, इसने डस ली।।
अलग-अलग घर में सब, लेकर इसको बैठें ।
कोई टोक दे जरा भी तो, बस उस पर ऐंठे ।।
मोबाइल एक बहुत ही, अच्छी सुविधा है ।
इसमें होकर कैद, बनाया हमने दुविधा है।।
मोबाइल के बिना लगे, ये जीवन सूना।
मानों पानी भी लगता है,जहर को पीना।।
“सागर” इसने हम सबको, जीना भी सिखाया
हमने ही हीरों से इसको, विलेन बनाया।।
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मूल रचनाकार-
बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश ‘सागर’
गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज



