
न राम अपनी अयोध्या ले गए,
न कृष्ण अपनी द्वारिका।
न शिव ही ले चले काशी संग,
फिर तू किस भ्रम में रे साधक !
मुट्ठी खाली आई थी यहाँ,
मुट्ठी खाली ही जाएगी।
माया की इस चकाचौंध में,
सच्चाई बस रह जाएगी।
सोना-चाँदी, मान-प्रतिष्ठा,
सब यहीं धरा रह जाएगी।
साँसों की ये किराएदारी,
एक दिन चुपचाप उतर जाएगी।
जो बाँटा तूने, वही तेरा है
जो छोड़ा, वो ही पाएगा।
नेकी का दीप जलाया जो तूने,
वही साथ निभाएगा।
महलों से पहले मन को जीत,
दिल में मंदिर बन जाएगा।
नाम-सुमिरन की धुन में बंदे,
जीवन गीत बन जाएगा।
न राम अपनी अयोध्या ले गए,
न कृष्ण अपनी द्वारिका।
साथ अगर कुछ जाएगा तो,
कर्म और प्रेम की पोटली सा।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




