साहित्य

सुबह शाम जो बर्तन धोता

शायर देव मेहरानियाँ

जब मिली ना कोई लिफ्ट हमें ,तो ख्याल ये मन मे आया।
घर तक दौड़े ऑटो के पीछे,दस का नोट बचाया।

चित्कार रही घर की दीवारें देहरी ने अश्क बहाया।
हुआ आज क्या घर में ऐसा और मातम कैसा छाया।

लगी कांपने रूह हमारी, कुछ भी समझ ना आया।
किया गौर जब अपने चाँद पर,मुह चिमंटे सा पाया।

प्राणों से प्यारी, है तू अब बस जान हमारी है तू ।
बच ना पाए कभी वार से,ऐसी तलवार दुधारी है तू ।

मुह तो लटकाया ऐसे,लगे राज कोई दिल मे छुपाया।
लगी सताने भूख प्यास पर,तुझको कॉप भवन में पाया।।

मुह तो लगे मुझे तेरा ऐसा,जैसा बेगान का कोई भूर्ता।
साड़ी रेशम की तुझे दिलाई,भले फटा हो मेरा कुर्ता।।

पाक जो ऊँगली ठहरी मेरी,कभी पडी ना तेरे गाल पर।
बता आज क्या खता हमारी,तरस ना आता मेरे हाल पर।।

आँखों में घडिय़ाली आँसू,लगे सड़ा टमाटर कोई फुट गया।
लगा हिलोरे लेने यूँ मन,मानो बाँध था कोई टूट गया।।

काम नहीं करते घर में तुम,कितना मुझे सताते।
कभी किया ना,झाड़ू पोंछा,रोज बहाने लाते।।

ग़र मैं कभी बेड पर लेटूँ,पैर जो मेरे दबाते।
रेशम सी जुल्फों को मेरी,ऊँगली से सहलाते।।

है कितनी खुश किस्मत वो बीवी,पति सारा काम है कर्ता।
जब भी लगे तलब नहाने की,नल से पानी लाकर धर्ता।।

बीबी अगर नहाकर आए सर में तेल लगाये।
लगें बाल ग़र उलझे उलझे,कंघी से सुलझाए।।

सुनो गौर से मेरी बात को,सुबह शाम जो बर्तन है धोता।
करे ना कभी शिकायत बीवी,आदर्श पति बस वो है होता।।
✍️शायर देव मेहरानियाँ

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