
मुमकिन ना हो मिलना तो
फ़िर नया रिश्ता जोड़ना क्या ।
जैसे आसमान में हल चला कर
सितारों को फ़िर करीने से
बोने की ज़ुर्रत करना ।
उम्र को यूँ ही होना है तमाम
चाहे बाकी हो और भी शाम ।
करना भी चाहे तो क्या करे कोई
कभी ज़िक्र-ए-गुल
ना ख़ार की बातें
ना भींगे रुख़सार की रातें ।
जब हक़ीकत हो सामने तो
फिर निगाहें चुराना क्या ?
अरसे से इक खाली घर में
ख़्वाहिश – ए – ताबूत लिए
जुस्तजू-बिन जो
भटकता फिरता है उसे
हिज़्र के आलम में करार-ए-नसीबां
मयस्सर हो कहाँ ?
मंजुला शरण ‘मनु ‘
राँची , झारखण्ड़ ।



