
आया माघ-शुक्ल फूले वन-वन-आँगन पलाश,
धरती का अद्भुत होए शृंगार रे!
मुस्काए बसंत ऋतुराज रे,
मुस्काए बसंत ऋतुराज रे।
कण-कण में विपुल जोश,
सर्दी ने खोया अपना रोष,
बनन बागन में चहुंँओर
रंग-रंगीले पुष्पों के कोष
मंद मन्द मुस्कुराता लहे
खिलखिलाए ऋतुराज रे!
मुस्काए ऋतुराज रे!
प्राकृतिक है छटा निराली
खगकुल का कलरव भारी।
पीली-पीली सरसों फूले
गेहुंँअन पर तो आए बाली।
नाचे-नाचे बसंत ऋतुराज रे!
नाचे-नाचे बसंत ऋतुराज रे!
पवन चले मन भाने वाली
झूला झूलें डाली-डाली,
फल फूलों की रेलमपेल
उर को है सरसाने वाली।
ऋतुओं का सिरमौर कहाए
मुस्कराए ऋतुराज रे, मुस्काए ऋतुराज रे!
मधुर-मधुर मधुप जो बोले
कलियन का मन वो तौले।
गुन-गुन करता डोल रहा है
कहलाए चितचोर रे,
खिलखिलाए ऋतुराज रे!
झूम रहा है ये मधुमास, उल्लास-विलास कैसा राज,
उत्साही सब जन बोलें
नेह-पगी वाणी में बोलें।
धरा – आसमाँ ‘सुषमा’ बिखरी
सबके सिर है चढ़कर बोली।
झूमें झूमें प्रकृति ऋतुराज रे!
झूमें झूमें प्रकृति ऋतुराज रे!
रचयिता –
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




