
आज की शिक्षा व्यवस्था पर गर्व किया जाता है। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, तकनीक उन्नत हो रही है और ज्ञान का विस्तार अभूतपूर्व है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह शिक्षा मनुष्य को विवेकशील, संवेदनशील और उत्तरदायी बना पा रही है। यदि शिक्षा के उपरांत भी समाज में दिशाहीनता, असंतोष और मूल्यहीनता बढ़ती जा रही है, तो यह संकेत है कि शिक्षा और संस्कार के बीच गहरी खाई उत्पन्न हो चुकी है।
सनातन परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका नहीं था, बल्कि जीवन निर्माण था। विद्या को विनय, विवेक और वैराग्य से जोड़ा गया। शिक्षा का अर्थ था व्यक्ति को अपने कर्तव्य, समाज और जीवन के उद्देश्य से परिचित कराना। गुरुकुल परंपरा में ज्ञान के साथ आचरण की शिक्षा अनिवार्य थी। आज वही शिक्षा जब संस्कार से कट गई, तो वह केवल सूचना का संचय बनकर रह गई।
वर्तमान समय में शिक्षा को प्रतिस्पर्धा का उपकरण बना दिया गया है। बच्चे को प्रारंभ से ही आगे निकलने की दौड़ में झोंक दिया जाता है। उसे यह तो सिखाया जाता है कि कैसे सफल होना है, पर यह नहीं सिखाया जाता कि सफल होकर समाज के प्रति उत्तरदायी कैसे बनना है। परिणामस्वरूप एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जो कुशल तो है, पर संवेदनशील नहीं।
इस संस्कारविहीन शिक्षा का प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देता है। विद्यार्थी अधिकार तो जानता है, पर कर्तव्य से अनभिज्ञ रहता है। वह आत्मविश्वासी दिखता है, पर भीतर से अस्थिर होता है। संबंधों में धैर्य नहीं, निर्णयों में गहराई नहीं और जीवन दृष्टि में स्थायित्व नहीं दिखाई देता। यही दिशाहीनता आगे चलकर सामाजिक असंतुलन का कारण बनती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह स्थिति गंभीर है। मूल्यहीन शिक्षा व्यक्ति को लक्ष्य तो देती है, पर अर्थ नहीं। जब जीवन केवल उपलब्धियों का जोड़ बन जाता है और उनमें कोई आंतरिक संतोष नहीं मिलता, तब व्यक्ति निरंतर तनाव और खालीपन से घिरा रहता है। यही कारण है कि शिक्षित समाज में भी अवसाद, आक्रोश और आत्मविस्मृति की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
समस्या शिक्षा में आधुनिकता की नहीं, बल्कि संस्कार की अनुपस्थिति की है। विज्ञान, तकनीक और वैश्विक ज्ञान आवश्यक हैं, किंतु उनके साथ यदि नैतिक विवेक न जुड़ा हो, तो वे समाज के लिए भार बन जाते हैं। शिक्षा को पुनः चरित्र निर्माण से जोड़ना होगा। विद्यालय केवल परीक्षा केंद्र न रहें, बल्कि मूल्यबोध के केंद्र बनें। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले नहीं, बल्कि दिशा देने वाले मार्गदर्शक बनें।
संस्कारविहीन शिक्षा राष्ट्र को कुशल कर्मी तो दे सकती है, पर जागरूक नागरिक नहीं। यदि हमें भविष्य की पीढ़ी को दिशाहीनता से बचाना है, तो शिक्षा को जीवन मूल्यों से पुनः जोड़ना अनिवार्य है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को मनुष्य बनाये। अन्यथा शिक्षित समाज भी भीतर से खोखला होता चला जाता है।
क्रमशः
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
(सनातन धर्म एवं संस्कृति प्रेरक-वक्ता व
राष्ट्रीय अध्यक्ष – माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी)
सम्पर्क सूत्र : +91-9450276488
(दी ग्राम टुडे)


