
किसी को यदि व्यायाम, योगाभ्यास, हंसने और अपनों के साथ रहने की बातें कही जायें तो हम कहने लगते हैं कि ‘हमारे पास समय नहीं है’। वास्तव में यह एक आदत या पैटर्न या ढांचा बन गया है। हमने वास्तव में जीना ही छोड़ दिया है।बस,हम तो जीवन को ढो रहे हैं।समय तो पहले भी चौबीस घंटे ही होता था और आज भी चौबीस घंटे ही है। लेकिन फिर भी हमारे पास समय नहीं है। फ़ालतू की रील देखने का समय है। व्यर्थ की राजनीतिक बहस करने का समय है। आईपीएल देखने का समय है।ताश खेलने का समय है। दूसरों की चुगली और निंदा करने का समय है। दूसरों की टांग खिंचाई करने का समय है।चौंक- चौराहों पर खड़े होकर लड़कियों को देखने का समय है।बदमाशी करने का समय है।दस दस घंटे तक सोने का समय है।रात के दो दो बजे तक जागकर पार्टियां करने का समय है। किन्हीं के झगडे को घंटों तक खड़े रहकर मजे लेने का समय है। नेताओं की रैलियों और कथाकारों की उबाऊ कथाओं में जाने का समय है।इन सब व्यर्थ के कामों के लिये किसी के पास समय की कोई कमी नहीं है। लोगों को क्या हो गया है? नकारात्मक गतिविधियों के लिये समय की कोई कमी नहीं है लेकिन सकारात्मक कामों के लिये किसी के पास कोई समय नहीं है।खुद के लिये, खुद के परिवार के लिये, दीन दुखियों की सेवा के लिये, योगाभ्यास के लिये, व्यायाम के लिये, सुबह-शाम की सैर के लिये या कोई खेल खेलने के लिये समय नहीं है।आधा घंटा आराम से बैठकर भोजन करने के लिये समय नहीं है।अच्छी -अच्छी पुस्तकों के स्वाध्याय करने का समय नहीं है। अपने चारों तरफ पेड़ -पौधे लगाकर उनको बड़ा करने का समय नहीं है।खेत या प्लाट में खाली पड़ी हुई जगहों पर विषाक्त दवाईयों से रहित फल सब्जियां उगाने का समय नहीं है। बूढ़े माता-पिता और दादा-दादी की सेवा करने का समय नहीं है। बड़े बुजुर्गो से मानवीय मूल्यों से भरी हुई शिक्षाप्रद कथा कहानियां सुनने का समय नहीं है। एकतरफा भौतिक विकास और समृद्धि की चकाचौंध में लोग कहां पहुंच गये हैं?सब कुछ होते हुये भी कुछ उपलब्धि नहीं है।सब कुछ होते हुये भी भीतर का खालीपन अमावस्या की रात की तरह बढता जा रहा है। उच्च -शिक्षित होते हुये भी अज्ञानता, संवेदनहीनता और छल आदि बढते जा रहे हैं। सैकड़ों प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों के होते हुये भी किसी भी जटिल बिमारी का रामबाण इलाज नहीं हो पा रहा है।हर गली और चौराहों पर हस्पताल और क्लिनिक होते हुये भी रोगियों की लाईनें हनुमान की पूंछ की तरह बढती जा रही हैं।जितने अधिक मानसिक चिकित्सालय बढते जा रहे हैं, उतने ही अधिक मानसिक रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।जितने प्रकार के सुस्वादु पौष्टिक भोजन, पाउडर, चूर्ण, चटनी,च्यवनप्राश,पाचक पेय आदि बढते जा रहे हैं,उतना ही अधिक लोगों की सेहत बिगड़ती जा रही है।नामी- गिरामी ह्दय रोग विशेषज्ञ स्वयं ही ह्दय रोगों से अकाल मृत्यु के मुंह में जा रहे हैं। मनोचिकित्सक स्वयं मनोरोगी बन रहे हैं। मनोवैज्ञानिक,फिलासफिकल,नैतिक और सामाजिक परामर्शदाताओं को खुद ही काउंसलिंग की सर्वाधिक आवश्यकता है। जितना अनाज की पैदावार बढती जा रही है, उतना ही भूखमरी बढ़ती जा रही है। मिलावट के ख़तरों के संबंध में जितनी समझ बढती जा रही है, उससे कयी गुना अधिक दूध -पानी- घी -तेल आदि में मिलावट बढती जा रही है। जितना बैंक बैलेंस बढता जा रहा है, उतना ही अधिक भ्रष्टाचार और कालाबाजारी बढ़ते जा रहे हैं। लोकतंत्र का जितना अधिक ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उतना ही अधिक तानाशाही बढ़ती जा रही है।जिन न्याय के मंदिरों में न्यायधीशों को भगवान् माना जाता रहा है, वहीं पर न्याय का सबसे अधिक गला घोंटा जा रहा है।जिस पुलिस को जनता- जनार्दन का रक्षक माना जाता है,वही मानवीय अधिकारों की भक्षक बनी हुई है। जिसके हाथों में जितनी अधिक पावर होती है,वही सबसे बड़े अपराधी बनते देखे जा रहे हैं। ताकत के साथ होश और समझ गायब मिलते हैं।
संसार में जिस समय उपरोक्त सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं,उस समय लोगों के पास खूब समय होता था।इस समय सदुपयोग लोग परस्पर दुख- सुख को सांझा करके करते थे।एक दूसरे की तकलीफ़ को समझकर परस्पर सहयोग करते थे। मुसीबत पड़ने पर काम में हाथ बंटाते थे। लेकिन आजकल किसी के पास किसी की तकलीफ़ को समझकर उसकी सहायता करने का समय ही उपलब्ध नहीं है।घर में पत्नी- पति की नौकरी करने की औसत बढ़ गई है लेकिन संतान का पालन -पोषण करने का समय नहीं है।धन -दौलत बढते जा रहे हैं लेकिन अपनी ही संतान के लिये प्यार दुलार का समय नहीं है।अच्छी आमदनी के चक्कर में बच्चे विदेशों में नौकरी कर रहे हैं लेकिन महलनुमा मकान में बूढ़े माता-पिता की सेवा करने का किसी के पास समय नहीं है।कयी बार बूढ़े माता -पिता बिमारियों का शिकार होकर मर जाते हैं और महीनों पश्चात् सड़ी हुई लाश ही मिलती है। बच्चे अंतिम संस्कार तक में नहीं पहुंचते हैं। कहते हैं कि हमारे पास समय ही नहीं है। पत्नी और पति अलग-अलग कार्यालयों में नौकरी करने के कारण रात देर तक कार्य में व्यस्त रहते हैं। पत्नी और पति के पास एक दूसरे को देने के लिये भी समय नहीं है। इससे अवैध शारीरिक संबंध, मानसिक तनाव, हताशा, अकेलेपन और लिव इन रिलेशनशिप जैसी बिमारियों में वृद्धि हो रही है। बहाना एक ही होता है कि हमारे पास समय ही नहीं है।
पहले जो बिमारी महीनों और वर्षों में मुश्किल से ठीक होती थी,आज वही बिमारी सप्ताह भर में ठीक हो जाती है लेकिन फिर भी किसी के पास अपने खुद के लिये भी समय नहीं है।जिन वस्त्रों को धोने में घंटों लग जाते थे,आज वाशिंग मशीनों से वही वस्त्रों की धुलाई मिनटों में है जाती है, लेकिन फिर भी समय की कमी का रोना रोया जाता है। पहले के समय पर परिवहन के साधनों की गति धीमी होने से जो दूरी कयी कयी दिन में तय होती थी, वही दूरी आज घंटे भर में पूरी हो जाती है लेकिन फिर भी लोगों के पास समय की कमी है। पहले एक दूसरे की खैर- खबर जानने के लिये चिट्ठी ही एकमात्र माध्यम होने से एक दूसरे का चेहरा देखे ही वर्षों हो जाते थे, लेकिन आजकल मोबाइल से क्लिक करते ही सैकिंडों में चेहरा भी देख लेते हैं और बातचीत भी हो जाती है। लेकिन फिर भी लोगों के पास समय नहीं है। पहले लकड़ी और उपलों से चुल्हे पर भोजन बनाने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन आजकल घर पर ही मिनटों में गैस सिलेंडर आ जाता है। लेकिन फिर भी लोगों के पास समय नहीं है। भोजन में विविधता,वैभव,विलास और चटपटापन दिखलाने के लिये सड़क,गली,चोंक, कस्बे, शहरों में ढाबों से लेकर पांच-सितारा होटल खुले हुये हैं लेकिन फिर भी करोड़ों लोग शाम को भूखे सोते हैं। पहले गरीब की चोखट से भी कोई व्यक्ति भूखा -प्यासा वापस नहीं जाता था, लेकिन आजकल करोड़पति और अरबपतियों के भव्य महलों से भी लोगों को एक दाना भी खाने को नहीं मिल सकता है।कुछ अवसरों और स्थानों को छोड़कर खाने- पीने का सारा सामान रुपये देकर ही मिलता है। इस पर विचार करने का किसी के पास समय ही नहीं है।पहले शादी -विवाह में महीनों पहले तैयारी शुरू हो जाती थी तथा तीन -तीन चार- चार दिन तक बारात रुकती थी और खूब सेवा सत्कार मिलता था।आजकल शादी -विवाह का सारा काम एक दिन में ही निपट जाता है, लेकिन फिर भी लोगों के पास समय नहीं है।
आज के युग में पहले के युगों की अपेक्षा धन, दौलत, जायदाद, मकान,बैंक बैलेंस, कारखाने,फैक्ट्रियां, स्कूल,कालिज, विश्वविद्यालय, आईटीआई, पोलीटेक्निक,आईआई एम,आईआईटी, रिसर्च सेंटर, शैक्षिक उपाधियां, परिवहन के साधन, संपर्क के साधन, सड़कें, बसें,ट्रक, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी,रेलगाड़ियां,चिकित्सक, चिकित्सालय, औषधियां, चिकित्सा पद्धतियां, धर्मगुरु,कथाकार,योगाचार्य,संत,भिक्षु, नेता,सुधारक, वातानुकूलन के साधन, तकनीक, वैज्ञानिक खोजें, प्रयोगशालाएं, विभिन्न प्रकार के हथियार, फसलों की पैदावार आदि सभी पहले के युगों की अपेक्षा हजारों गुना अधिक है। लेकिन फिर भी आजकल सर्वाधिक भूखमरी, बेरोजगारी, गरीबी, विषमता, भेदभाव,अभाव, बिमारियां, भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार, बलात्कार, आतंकवाद, पर्यावरण प्रदुषण, जंगलों का विनाश,युद्ध और मानसिक बिमारियां मौजूद हैं। आश्चर्यजनक है कि उपरोक्त सुविधाओं की विविधतापूर्ण प्रचुरता के बावजूद लोगों के पास समय नहीं है।हर सकारात्मक, सृजनात्मक और खुद के हितार्थ काम करने के लिये लोगों के पास समय नहीं है। अपनी शारीरिक निरोगता, मानसिक स्वास्थ्य और आत्मिक शांति के लिये लोगों के पास समय नहीं है। स्वयं को जानने के लिये लोगों के पास समय नहीं है। स्वयं की खुशी,प्रसन्नता, संतुष्टि और तृप्ति के लिये लोगों के पास समय नहीं है।कुछ समय पहले समय न होने की बिमारी केवल शहरों तक सीमित थी, लेकिन अब तो इस बिमारी ने गांव -देहात में भी प्रवेश कर लिया है। सुविधाओं की प्रचुरता ने लोगों को स्वार्थी, लालची और धोखेबाज बना दिया है।
सुविधाओं की प्रचुरता,बैंक बैलेंस में बढ़ोतरी, शिक्षा संस्थानों में वृद्धि और सुचनापरक ज्ञान की बहुतायता ने लोगों को रुखा,नीरस, गंभीर,अकेला,हताश, चिंतित, उपयोगितावादी,अहंकारी और मानसिक रोगी बना दिया है। किसी के पास किसी के लिये समय नहीं है। किसी के पास किसी के दुख,दर्द,परेशानी और अकेलेपन को हल्का करने का समय नहीं है। इसके साथ -साथ विचित्र यह भी है कि कोई भी अपने सुख में किसी को सम्मिलित नहीं करना चाहता।अपने दुख के समय सभी लोग यह आशा करते हैं कि मित्र,प्यारे, रिश्तेदार और पडौसी सभी उनकी मदद करने को दौड़ते चले आयें। लेकिन दूसरों पर जब कोई दुख या परेशानी आते हैं तो खुद किसी की मदद नहीं करते।बहाना यही होता है कि ऐसे फालतू कामों के लिये उनके पास समय नहीं है।
कितना भी धन-दौलत, गाड़ी-बंगले, जमीन -जायदाद जोड़ लो, आखिर में एक कपड़ा ही नसीब होगा। बाकी सब यहीं छूट जायेगा। जिंस शरीर को अपना समझते हो,वह भी साथ नहीं देता है, उसे भी आग में डालकर जला दिया जाता है। आखिर में बस कुछ मुट्ठी राख ही बचेगी। सबसे महत्वपूर्ण, सबसे कीमती, सबसे आवश्यक और अंत तक तथा सदा -सदा के लिये जो साथ में रहता आया है,वह अपना आत्मस्वरुप है। जीते जी उसके लिये भी तो कुछ करो। उस आत्मस्वरुप की तलाश करने,उसको जानने,उसको पहचानने, उसमें डूबने तथा उसका साक्षात्कार करके आनंदित होने के लिये भी तो कुछ समय निकाल लिया करो। यदि ऐसा कर लिया तो चित्त पर जमे हुये मल और विकारों का शोधन हो जायेगा। इससे खुद को जानने, समझने और खुद में ठहरने की योग्यता के लिये भूमिका तैयार हो जाती है।
कठोपनिषद् ने जागने के संबंध में कहा है –
उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदंति।।01/03/14
अर्थात् उठो,जागो।उनके महान आत्माओं के पास मार्गदर्शन के लिये जाओ, जो जागे हुये हैं, होशपूर्ण हैं, जिन्होंने स्वयं का साक्षात्कार कर लिया है। जानने वालों के अनुसार यह मार्ग छूरे की तेज धार के समान कठिन है।
आप जीवन में कोई भी काम- धंधा करते हों, लेकिन आप चौबीस घंटे में से घंटा दो घंटा अपने लिये भी निकालकर रखें और इस समय को स्वाध्याय,सेवा,अनुशासन,व्यायाम, कोई खेल,सात्विक भोजन,आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान के साथ शरीर,मन, बुद्धि को निरोगी और स्वस्थ रखने में लगायें।उपरोक्त अनुशासन से होश,जागरुकता, साक्षी भाव, स्वयं में ठहरने से शांति, संतुष्टि, संतुलन में बढ़ोतरी होती जायेगी। किसी व्यक्ति की यही वास्तविक पूंजी है।
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डॉ.शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119




