आलेख

जल, जंगल, जमीन: मानवता की संस्कृति और अस्तित्व

सत्येन्द्र कुमार पाठक

‘जल, जंगल और जमीन’—ये तीन शब्द मात्र भौतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि ये उस त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसके भीतर पृथ्वी का समस्त जीवन स्पंदित होता है। यदि ब्रह्मांड में पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ कहा जाता है, तो इसका श्रेय इन्हीं तत्वों को जाता है। मानव सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि हमारी प्रगति की कहानी इन्हीं तीन तत्वों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, यह आधार स्तंभ डगमगा रहा है। महान आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने जिस “जल, जंगल, जमीन” के हक की लड़ाई शुरू की थी, वह आज केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जुड़ाव में भारतीय मानस में प्रकृति को कभी भी ‘उपभोग की वस्तु’ नहीं माना गया। हमारी संस्कृति में नदियों को ‘माँ’ का दर्जा दिया गया है—गंगा, यमुना, नर्मदा केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी शक्तियां हैं। वनों को ‘तपोवन’ कहा गया, जहाँ ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया।
आदिवासी समाज के लिए तो जंगल उनका देवालय है। उनके लोकगीतों की लय और नृत्यों की थाप में पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों का संगीत घुला होता है। उनके लिए जमीन का एक टुकड़ा केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की स्मृति और उनकी पहचान (Identity) है। ‘पत्थलगड़ी’ जैसे आंदोलन इसी सांस्कृतिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का उद्घोष हैं। यह हमें याद दिलाता है कि जब तक जमीन सुरक्षित है, तब तक संस्कृति जीवित है।
पृथ्वी के फेफड़े और रक्त का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ‘जल, जंगल और जमीन’ एक अटूट चक्र (Cycle) में बंधे हैं: जंगल (पृथ्वी के फेफड़े): वन न केवल कार्बन सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं। वनों का विनाश सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को निमंत्रण देता है।
जल (जीवन का अमृत): बिना जल के न कृषि संभव है, न उद्योग और न ही जीवन। नदियों का सूखना या उनका प्रदूषित होना एक मृतप्राय सभ्यता की ओर इशारा करता है। जमीन (अन्नपूर्णा): मिट्टी केवल धूल नहीं है; यह वह उपजाऊ आधार है जो अरबों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को आश्रय देती है। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और खनन ने इस आधार को खोखला कर दिया है।. विकास की अंधी दौड़ और विनाश के संकेत की पूंजीवादी विचारधारा ने प्रकृति को ‘बाजार’ बना दिया है। ‘विकास’ केनाम पर जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उनमें अक्सर पारिस्थितिक संतुलन की अनदेखी की जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हाल के वर्षों में आई आपदाएं—चाहे वह भूस्खलन हो या अचानक आई बाढ़—प्रकृति की इसी चेतावनी का परिणाम हैं।
जब हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़ा करते हैं या पहाड़ों का सीना चीरकर अनियंत्रित खनन करते हैं, तो हम केवल जमीन नहीं खोते, बल्कि उस सुरक्षा कवच को नष्ट कर देते हैं जो सदियों से हमें आपदाओं से बचाता आया है। विडंबना यह है कि ‘वन अधिकार अधिनियम’ जैसे कानून कागजों पर तो सशक्त दिखते हैं, लेकिन धरातल पर स्थानीय समुदायों और आदिवासियों को उनकी अपनी ही जड़ों से बेदखल करने की साजिशें जारी हैं।
संरक्षण का एकमात्र मार्ग विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) जैसे अवसर हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आधुनिक समाज ने प्रगति के नाम पर क्या खोया है। आदिवासी समुदाय का यह नारा—”जल, जंगल, जमीन हमारा है”—स्वामित्व का अहंकार नहीं, बल्कि संरक्षण की जिम्मेदारी का बोध है। वे प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसके ‘ट्रस्टी’ बनकर रहते हैं।
आदिवासी दर्शन हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लो जितना जीवन के लिए आवश्यक है। यदि हमने उनके इस संघर्ष और मूल्यों को नहीं अपनाया, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे मरुस्थल में पैदा होंगी जहाँ धन तो होगा, लेकिन पीने को स्वच्छ पानी और सांस लेने को शुद्ध हवा नहीं होगी। यदि हमें मानवता को बचाना है, तो हमें अपने दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा । : विकास ऐसा हो जो भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे। स्थानीय समुदायों की भागीदारी: नीति निर्धारण में उन लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो जमीन से जुड़े हैं।
केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। ‘जल, जंगल और जमीन’ का संरक्षण कोई दान या उपकार नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वयं के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। बिरसा मुंडा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता और स्वार्थ प्रकृति को निगलने का प्रयास करें, तब प्रतिरोध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। प्रकृति का विनाश वास्तव में मनुष्य का आत्मघाती कदम है। हमें यह समझना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। यदि हम जल को शुद्ध, जंगल को हरा और जमीन को उर्वर बनाए रखने में सफल रहे, तभी हमारी संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व बचा रहेगा। आने वाला कल इस बात पर निर्भर करेगा कि आज हम इन तीन स्तंभों का कितना सम्मान करते हैं।

करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

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