
आज बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मां शारदे के चरणों में इन दोहों के माध्यम से अपने पारिजात प्रसून अर्पित करती हूं।
पीत प्रभा में लिपट गई, धरती की हर श्वास।
वीणा-के स्वर में रचा, शब्दों का आकाश।
शारदा के कर-कमल से, झरे ज्ञान के कण।
मौन तिमिर गलता चला, जागा चिंतन-मन।
अमर कुंज में गूँज उठा, कोयल का संदेश।
ऋतु बसंत स्पर्श से, आया नव परिवेश।
कलम हुई अब साधना, अक्षर हुए प्रसाद।
साहित्य के शिखरों चढ़े, भावों के संवाद।
बसंत पंचमी बन गई, भावों का ये पर्व,
बुद्धि विवेक और ज्ञान से मिटता सारा दर्प।
डॉ मंजु जौहरी मधुर नजीबाबाद (बिजनौर)
8851760946
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