
सुंदरता तन की या मन की, यह प्रश्न बार-बार आता है।
सुंदरता जिसने देखी तन में, वह उलझन में फंस जाता है।
तन की सुंदरता देख कर जब मन दीवाना हो जाता है
तन के ढलते ही वह सच्चा प्रेम भी एक दिन खो जाता है।
अकेलापन, अवसाद, पीड़ा में ही आगे का जीवन जाता है।
मन की सुंदरता जिसने भी देखी, परमात्मा की छवि हर रूप में देखी।
मन तक जो भी पहुंच गया, परमात्मा से फिर वह कहां दूर गया।
जब-जब भी दैवीय सुंदरता और
परमात्मा का वास दिखता है,
फिर भले ही हम अकेले हों या समूह में,
परमात्मा तो हमें ही मिलता है।
तन की सुंदरता तो नश्वर है, अनश्वर है मन की सुंदरता।
तन की सुंदरता क्या लखे हैं मन,
मन की सुंदरता में ही मन तू लगा।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




