
तुझे पीपल के पत्ते पे!!
रोज एक खत लिखती पिया !!
तकिया हाथों का लगाती
बिछोंना माटी का बनाती
रातों को सितारों से करती !!
तेरे प्यार की मीठी बतिया!!
ये ऑंसू भी तुझे याद कर!!
जमी पे लिखे तेरा नाम पिया!!
वो बीते पलो को याद कर!!
जले मेरा मासूम जिया !!
तुम्हारा इंतजार करते-करते,
जाने कब बीती ये बैरन रतिया।
ये दिल शीशे सा टूट कर!!
आज फिर बिखर गया !!
तुम्हारा इंतजार करते करते !!
वो जाने कब बित गईं रात!!
तनहाई में रातें कांटो सी चुभने लगी है,
ये निगाहें आज भी दरवाजे पे टिकी है
अब तो इंतजार की घड़ियां भी! !
मुझसे सवाल पे सवाल करने लगी है।
हाथो से तकिया भी छुटने लगा है!!
माटी का बिछोंना भी खिसकने लगा है!!
तुम ही बताओ अब और कितना इंतजार करूं
अब तू ही बता दे जीऊं या मरूं।
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शिवा सिहंल आबुरोड




