
बारिश में छप छपा छप्प और
नाव चलाना भूल गए,
जब से हम बड़े हुए
हँसना मुस्काना भूल गए।
बचपन की बचकानी बातें
मुझको खूब हँसाती हैं,
समय बोझ जब भारी होता
यादें पास बुलाती हैं।
माँ का आँचल थी जो दुनिया
माँ की छाया भूल गए,
दुनिया की आपाआधी में
हँसना मुस्काना भूल गए।
मात पिता की प्यारी बातें
दुख सारा हर लेती थी,
आँगन की वह हंसी ठिठोली
मंत्र मुग्ध कर देती थी।
हर पल सीख सिखाने वाले
दुनिया से अब दूर हुए,
पराएपन को गले लगा कर
जीने को मजबूर हुए।
गुड़िया गुड्डा आँखमिचौली
वाले खेल निराले थे,
कट्टी मिट्ठी करते हरदिन
पर हर बच्चे प्यारे थे।
पगडंडी तज सड़क नाप कर
घर छोड़ हम दूर हुए,
रोटी कपड़ा घर के चक्कर में
परेशान भरपूर हुए।
डॉ. पुष्पा सिंह




