साहित्य

भोले की ही माया

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

तन-मन मेरा हुआ बावरा,
भोले के संग चलने से,
मजा नहीं है जीवन का,
बस एक जगह ही रुकने से।
तन-मन मेरा ….
ऐसा-वैसा कहीं नहीं है,
जैसा भोले को देखा,
जीवन है बंधन की माया,
भोले की है एक रेखा।
तन-मन मेरा …..
सत्य पकड़ कर जो भी चल दे,
जीवन उसको भाया है,
जो भी यहां-वहां घटता है,
भोले की ही माया है।
तन-मन मेरा ….
मनका-मनका,कंकर-कंकर,
दोनों में कोई भेद नहीं,
मुस्काते हैं दोनों मिलकर,
जब आ जाते हैं शंकर।
तन-मन मेरा ….
इसका-उसका छोड़ दें सारा,
मुस्कानों की बात करें,
आ जाएंगे भोले शंकर,
प्रेम की हम बरसात करें।
तन-मन मेरा ….
( 248/306वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर, इन्दौर (म.प्र.)

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