
ये त्यौहार क्यों आते हैं,कुछ कहते, कुछ सिखलाते हैं।
बिखरे मन की धूल हटाकर,जीने का ढंग समझाते हैं।
जब थक जाता है जीवन ,जब उम्मीदें डगमग जाती हैं।
तब हँसी बनकर, दीप बनकर,ये चुपके से आ जाते हैं।
रंगों में घुलकर रिश्ते मिलते,दीपों में सपना जलता है।
सूनी आँखों की पलकों पर,फिर से कोई अपना पलता है।
ये त्यौहार क्यों आते हैं,रूठे दिलों को मनाते हैं।
वक़्त की ठंडी दूरियों को,दो पल में ही पिघलाते हैं।
थाली में सजी मिठाइयों संग,बचपन फिर मुस्काता है।
माँ के हाथों की खुशबू में,हर डर कहीं खो जाता है।
गलियों में गूँजती हँसी यहाँ,ढोलक, ताली, गीत बजे।
मन के भीतर सोई खुशी,तालों को तोड़ बाहर सजे।
ये त्यौहार क्यों आते हैं,इतिहास हमें दोहराते हैं।
त्याग, तपस्या, बलिदानों की,गाथाएँ फिर से गुनगुनाते हैं।
राम, रहीम, नानक, ईसा,सबका एक ही संदेश यहाँ।
प्रेम, क्षमा और भाईचारा,बसता है हर एक साँस यहाँ।
जब दीवारें ऊँची हो जातीं,जब नफ़रत आग लगाती है।
तब प्रेम बनकर, दीप बनकर,त्यौहार शांति सिखलाते हैं।
ये त्यौहार क्यों आते हैं,इंसान हमें बनाते हैं।
खुद से पहले औरों का दुख,महसूस करना सिखलाते हैं।
इसलिए हर मौसम में आकर,जीवन को नव रंग देते हैं।
टूटे मन को जोड़-जोड़कर,हमको फिर से हम करते हैं।कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




