
कुरुक्षेत्र में कृष्ण कन्हैया, का अनुपम वरदान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
महायुद्ध में जब अर्जुन को, हुआ जगत का मोह।
अपनों पर क्यों बाण चलाएँ, अनुपम अद्भुत छोह॥
सकल सृष्टि संचालक स्वामी, दिए कर्म का ज्ञान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
कहा कृष्ण ने धर्म यही है, पार्थ उठाओ बाण।
पापी का संहार करो तब, जग का हो कल्याण॥
कहा पार्थ से मधुसूदन ने, मैं ही हूँ भगवान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
अखिल विश्व में गीता के सम, नहीं दूसरा ग्रंथ।
सभी सभ्यता शिक्षा पातीं, गह गीता का पंथ॥
सत्य सनातन संस्कृति सुंदर, गीता का सम्मान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
अजर अमर है आत्मा अर्जुन, सब मेरे ही अंश।
नाश देह का होता हरदम, मै ही हूँ हरिवंश॥
युगों-युगों से गाती गीता, शुचिता का गुणगान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
जीवन में सत्कर्म किए जा, यह गीता का सार।
करे सत्य का पालन जो नर, उसका बेड़ा पार॥
सत्य मार्ग पर चलकर तोड़ो, दुश्मन का अभिमान।
कर्म किए जा फल की चिन्ता, मत कर ऐ इन्सान॥
*© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’*
*प्रयागराज, उत्तर प्रदेश*




