आलेख

योगाभ्यास में प्राणवह नाड़ियों का महत्व

डॉ. शीलक राम आचार्य

योग और योगाभ्यास में जिन प्राणवह नाड़ियों का जिक्र किया जाता है,वो जिक्र नया न होकर कयी हजार वर्षों पुराना है।दस हजार वर्षों पूर्व रचित प्रश्नोपनिषद् के तीसरे प्रश्न में कहा गया है –

‘हृदि ह्येष आत्मा।
अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिद्वार्सप्तति: प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति:।।’
इसका अर्थ है कि आत्मा का निवास हृदय में है।इस ह्दय के साथ मुख्य मुख्य 101 नाड़ियां हैं। इनमें से एक एक से 100-100 शाखाएं फूटी हैं।उन शाखाओं से भी एक एक से बहतर बहतर हजार प्रति शाखाएं फूटी हैं। हृदय से लेकर इस संपूर्ण नाड़ी संस्थान में व्यान प्राण विचरण करता है। हृदय से एक नाड़ी ऊर्ध्व देश की ओर मस्तिष्क को जाती है। उसमें उदान प्राण बहता है।यही उदान पुण्य कर्म करने से पुण्य लोकों में ले जाता है। पाप कर्म करने से यही उदान पाप लोकों में ले जाता है। दोनों प्रकार के कर्म करने से उदान प्राण आत्मा को मनुष्य लोक लेकर जाता है।देह में निवास करने वाला यही प्राण आदित्य नाम से समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहता है। मृत्यु के समय जिस प्रकार का चित्त होता है,वही चित्त प्राण के पास जाता है। प्राण अपने तेजबल से आत्मा के पास जाता है। प्राण ही तेजबल, चित्त और आत्मा को अपने संकल्पों के अनुसार के लोकों में लेकर जाता है।तेजबल, चित्त और आत्मा से प्राण का संबंध है। शारीरिक और मानसिक प्राण की दो शक्तियां हैं। प्राण की शारीरिक शक्ति उसका तेजबल है। इसी से शरीर गति करता है।प्राण की मानसिक शक्ति उसका चित्त है।इस चित्त द्वारा ही संकल्प विकल्प होते हैं।मरते समय पर प्राण अपने पूर्व निर्मित तेजबल और चित्त सहित विभिन्न लोकों में जाता है।शरीर से बाहर निकलते समय प्राण शारीरिक ( तेजबल ), मानसिक( चित्त) ,आत्मिक ( आत्मा) इन तीन आधारों को साथ लेकर चलता है।वह उदान नाड़ी से होते हुये ऊपर की ओर निकलता है। ऐसे व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है।यह है उपनिषदों का उच्च कोटि का आध्यात्मिक ज्ञान। तैत्तिरीय उपनिषद् ने भृगुवल्ली में आज से दस हजार वर्षों पहले ही वर्णन किया है कि सेवाभाव रखने वाले व्यक्ति को प्राणापान की साधना (श्रीमद्भगवद्गीता में प्राणापान,बौद्ध मत में पानापान) से सहज ही योगक्षेम होता है। देखिये –

‘योगक्षेम इति प्राणापानयो:।।’
[31/12, 12:27 pm] .: योग में जिन नाड़ियों का विवरण मिलता है,वो प्राण शरीर में स्थित होती हैं। बाहरी आंखों से उन्हें नहीं देखा जा सकता है। सृष्टि के शुरू में ही सृष्टि के कल्याणार्थ प्रकट वेदों में योगविद्या के संदर्भ में संकेत मिलते हैं। उपनिषदों में इस संबंध में थोड़ा विस्तार मिलता है। हजारों वर्षों पहले लोग विवरण देने की बजाय अभ्यास और अनुशासन पर अधिक जोर देते थे।इसीलिये विस्तार नहीं मिलता है। ज्यों- ज्यों समय व्यतीत होता गया, अभ्यास और अनुशासन की अपेक्षा प्रचार करने में रुचि बढती गई तथा अभ्यास और अनुशासन में कमी आती गई।आज अभ्यास और अनुशासन न के समान है तथा प्रचार अधिकाधिक उपलब्ध है। चिंतन,सोच, विचार आदि बहुतायत से हो रहे हैं लेकिन अभ्यास और अनुशासन गायब हैं।यह आधुनिक युग की बिमारी है।
‘इड़ा नाड़ी’ में रहते हुये सोचना,विचारना, चिंतन करना आदि होते हैं। व्यक्ति अपने मनोजगत् में ही विचरण करता रहता है।इसी मनोजगत् को ही व्यक्ति वास्तविक मानकर जीवन जीने लगता है। भौतिक जगत् की उपेक्षा करने लगता है।इस उपेक्षा से उसका शारीरिक विकास धीमा होकर शरीर अनेक प्रकार की बिमारियों से ग्रस्त हो जाता है।
‘पिंगला नाड़ी’ में रहते हुये बाहरी कर्म करना, बाहरी गतिविधियों में उलझे रहना, पुरुषार्थ करना, सदैव गतिमान रहना, रजोगुण की प्रधानता रहना आदि मुख्य होते हैं।ऐसा व्यक्ति शारीरिक रूप से मोटा ताजा और हृष्ट-पुष्ट होता है।खूब खाता- पीता- भोगता है।शरीर में ही मस्त रहता है। चार्वाक की तरह सदैव शरीर की सेवा करने में लगा रहता है।खूब व्यायाम,कसरत,खेल, मारपीट आदि में व्यस्त रहता है। लेकिन ऐसा व्यक्ति पिंगला नाड़ी के उपरोक्त प्रभाव के कारण मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक रूप से कमजोर हो जाता है। ऐसे व्यक्ति में क्षत्रियोचित गुण तो होते हैं लेकिन ब्रह्मणोचित गुणों का अभाव हो जाता है।उसकी बुद्धि,मेधा,स्मृति, चिंतन, विचार,तर्क, समीक्षा, विश्लेषण आदि कमजोर हो जाते हैं।यह पिंगला नाड़ी की अधिक सक्रियता के कारण होता है।
प्राण शरीर में तीसरी महत्वपूर्ण नाड़ी ‘सुषुम्ना नाड़ी’ है। इसमें उपरोक्त दोनों नाड़ियों के गुणधर्मों में संतुलन करने की क्षमता होती है।यह भी कहा जा सकता है कि दोनों नाड़ियों का संतुलन ही ‘सुषुम्ना नाड़ी’ होती है। संतुलन,तृप्ति,संतोष,साक्षीभाव,होश, जागरुकता,ध्यान आदि इस नाड़ी के गुण हैं।
सुषुम्ना नाड़ी संतुलन,ठहराव, साक्षी भाव
शरीर,प्राण और चित्त के परस्पर संबंध पर हठप्रदीपिका,2/2 में कहा गया है –
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।

इसका अर्थ है कि जब तक प्राण चलता है,तब तक चित्त चलता रहता है।जब प्राण को रोक लिया जायेगा तो चित्त में रुक जायेगा। यानी प्राण के संयम से चित्त का संयम होता है, इसके बगैर नहीं। केवल इससे ही योगाभ्यासी व्यक्ति स्थिरता को प्राप्त होता है।इसी ग्रंथ के 2/4 श्लोक में कहा गया है –

मलकुलसु नाडिषु मारुतो नैव मध्यग:।
कथं स्यादुन्नमनिभाव: कार्यसिद्धि: कथं भवेत्।।

इसका अर्थ है कि प्राणवह नाड़ियों में जब तक मल भरा रहेगा,तब तक सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों का संचार नहीं होगा। और इसके बगैर मन पर नियंत्रण होकर मोक्ष भी नहीं मिलेगा। यानी कहने का निहितार्थ यह है कि प्राण का महत्व सर्वाधिक है।इस प्राण पर नियंत्रण करना आवश्यक है।इसके लिये सर्वप्रथम शरीर की शुद्धि आवश्यक है।शरीर शुद्धि किये बगैर प्राण के साथ कुछ भी अभ्यास आदि करना अनेक शारीरिक और मानसिक बिमारियों का कारण बनता है।इसीलिये विपस्सना,होश, जागरण, साक्षीभाव जैसी धारणा और ध्यान की विधियों पर सीधे ही काम नहीं करना चाहिये।
व्यक्ति के शरीर में मुख्य छह चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर,अनाहत,विशुद्धि और आज्ञा (तीसरा नेत्र)होते हैं। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक माया का प्रभाव मौजूद है। सातवे पायदान यानी सहस्रार पर माया का प्रभाव नहीं होता है। वहां पर न तो वृत्तियां प्रभावी रहती हैं तथा न ही त्रिगुणों का कोई प्रभाव रहता है। सहस्रार पर गया व्यक्ति इंद्रियातीत हो जाता है।उसे ही इंद्रजीत कहा गया है।
मूलाधार चक्र काला होता है। मणिपुर चक्र नारंगी होता है।अनाहत चक्र नीला होता है।विशुद्धि चक्र हरा होता है। आज्ञा चक्र सफेद होता है। सहस्रार पारदर्शी होता है।उसका कोई रंग नहीं है।इस तरह से चक्र जागरण की साधना अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने की यात्रा है। बृहदारण्यक उपनिषद्,1/3/28ने इसी सत्य की ओर संकेत किया है-

असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मा अमृतं गमय।।

अर्थात् मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो। अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
यहां पर माया,अविद्या,भ्रम, अज्ञान, बेहोशी से मुक्ति की ओर ले जाने की प्रार्थना है। प्राणायाम से यह सब संभव हो सकता है। इसकी शुरुआत शरीर शुद्धि से ही हो सकती है।बीच से कोई यात्रा शुरू नहीं हो सकती। सभी यात्राएं शुरू से ही शुरू हो सकती हैं।
मूलाधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक द्वैत की प्रधानता रहती है। अद्वैतानुभूति सहस्रार पर होती है। व्यक्ति का अंतःकरण माया के प्रभाव में रहता है। अंतःकरण में चित्त, अहंकार और मन आते हैं।इस अंतःकरण को ही चित्रगुप्त कहा गया है।यह बाहर दिखाई नहीं देता, इसलिये इसे गुप्त कहा गया है।इसके अंतर्गत सभी वस्तुएं त्रिगुणात्मक होती हैं।सतोगुण यानी संतुलित। रजोगुण यानी चलायमान। तमोगुण यानी बेहोश। ज्यों ही कोई व्यक्ति शरीर शुद्धि और प्राण शुद्धि कर लेता है, त्यों ही उसे ओंकार नाद सुनाई देने लगता है। इसे अनाहत नाद या अनहद नाद भी कहते हैं।यह कानों से सुनाई नहीं देता है, अपितु यह मौन की आवाज है। इसमें मौन बोलता है। इसमें शांति, संतुलन, संतुष्टि,होश, जागरण आदि बोलते हैं।बहरा व्यक्ति भी साधना द्वारा इसे सुन सकता है।
ओंकार नाद/अनाहत नाद/शून्यनाद/दिव्यनाद/रुहानी आवाज/आसमानी आवाज/धुन/लोगोस आदि इसी के नाम हैं।’सूरतशब्दयोग’ में इसी को सुनने की साधना की जाती है।यह विज्ञान /चिकित्सा विज्ञान की सीमा से परे है। इसे मस्तिष्क के माध्यम से सुनते अवश्य हैं, लेकिन यह वहां उत्पन्न नहीं होता है।यह तो स्वयं अस्तित्व की आवाज है। स्थूल यंत्रों की पकड़ में यह नहीं आती है।यह अनाहत नाद सभी छह चक्रों में मौजूद होता है। सर्वप्रथम इसका श्रवण मणिपुर और अनाहत चक्र के मध्य में होता है। मूलाधार चक्र से लेकर मणिपुर चक्र तक माया का प्रभाव सर्वाधिक होता है। अनाहत चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक माया का प्रभाव तो रहता है, लेकिन योग का साधक कुछ कुछ जागरूक होता है।
मणिपुर चक्र पर अग्नि तत्व प्रधान होता है, जबकि अनाहत चक्र पर वायु तत्व प्रधान होता है। अग्नि और वायु के मिलन स्थल पर सर्वप्रथम अनाहत नाद सुनाई पड़ने लगता है। मूलाधार चक्र पर प्रारब्ध कर्मों का प्रभाव सर्वाधिक होता है।इस चक्र पर जीने वाला व्यक्ति पशुवत् पूर्वजन्मों के अनुसार मूल प्रवृतियों के वश होकर जीवन जीता है। यानी वह पशुओं की तरह गुलाम होता है।वह भोग में ही रत रहता है। नेता, धर्मगुरु, सुधारक, अपराधी और प्रभावी लोग जैसा चाहते हैं,वो उनके कहे अनुसार जीवन जीता है।वह अपने विवेक से कुछ भी करने में असमर्थ होता है। ऐसे लोग ही तानाशाहों की तानाशाही को बनाये रखने में सहयोगी बनते हैं। धर्मगुरुओं और नेताओं के अंधभक्त इसी श्रेणी में आते हैं।
कुछ लोगों ने योगाभ्यास में भी सार्ट कट तलाश करने के प्रयास किये हैं। लेकिन योग क्षेत्र में इससे पाखंड और शोषण को ही बढ़ावा मिला है।सार्ट कट यानी बिना यम,नियम के अनुशासन तथा बिना शरीरशुद्धि के सीधे ही प्राण शरीर पर काम करके आत्मसाक्षात्कार की उपलब्धि प्राप्त करना। जिन्होंने भी इस प्रकार के प्रयास किये हैं,उनको कुछ सिद्धियां तो अवश्य मिल जाती हैं, लेकिन लोगों के कारण योगविद्या में एक तरफ जहां पाखंड और ढोंग को बढ़ावा मिला है, वही दूसरी तरफ योगविद्या को व्यापार में भी बदलती जा रही है। प्रारब्ध कर्मों के चित्त में बने संस्कारों के मल की धुलाई किये बगैर आगे बढना साधक को भी मुसीबत में डालना है तथा साथ में इससे नकली योगियों को भी ठगी करने,गुरुडम फैलाने का मौका मिलता है। ऐसे योगाभ्यासी आजीवन शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक मुसीबतों से जुझते रहते हैं। हमारे ही युग के महान दार्शनिक और लीडबीटर,कर्नल अल्काट तथा ब्लावट्स्की के मार्गदर्शन में विभिन्न योग परंपराओं पर काम करने वाले समकालीन अष्टावक्र के नाम से प्रसिद्ध जिद्दू कृष्णमूर्ति के साथ ऐसा ही हुआ था।वो आजीवन भयंकर सिरदर्द की पीड़ा से ग्रस्त रहे थे। ऐसे और भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। योगाभ्यास को पूरे अनुशासन,संयम और योग्य गुरुओं के मार्गदर्शन में किया जाना आवश्यक है।
राजयोग सभी योगों का मूल है।इसी की विभिन्न धाराएं हठयोग,मंत्रयोग,जपयोग, सहजयोग,लययोग, सूरतशब्दयोग, कुंडलिनी योग,प्राणयोग, विपस्सना आदि विभिन्न नामों से संसार में प्रसिद्ध हैं। ध्यान रहे कि सभी प्रकार की योग साधनाओं में गुरु का मार्गदर्शन जितना आवश्यक है,उतना ही आवश्यक साधक द्वारा लगातार अनुशासन और संयम से साधना करना है। गुरु का शक्तिपात, आशीर्वाद,ऊर्जादान आदि गुरु द्वारा नहीं अपितु साधक के समर्पण, भक्तिभाव और तैयारी से घटित होता है। आजकल के योग साधक स्वयं किसी प्रकार की कोई साधना नहीं करके केवल गुरु के शक्तिपात, आशीर्वाद और ऊर्जादान पर अंधविश्वास करके बैठे रहते हैं।ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। योग साधना में साधक द्वारा अपनी दिनचर्या में स्वयं की साधना, स्वयं के आचरण, स्वयं के संयम और अभ्यास से ही कोई उपलब्धि हो सकती है।यही सनातन भारतीय योगविद्या की सीख है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र

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