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होली की हुड़दंग रे रंगरसिया………….!

मदन वर्मा " माणिक "

होली की हुड़दंग रे रंगरसिया, होली हो और मस्ती ना आए, आनंद ना आए, धमाल मचाने का मन ना हो ऐसा हो नहीं सकता। होली तो आनंद का पर्याय है। पिछली सारी होली यादगार होती है। गली-मोहल्ले, बस्ती के यारों, दोस्तों के संग व युवाओं के संग, सहपाठियों संग खेली गई होली यादगार होती है। पुरानी होली टांगा – टोली कर रंग के कड़ावों में डुबो, भिगों कर चौराहे -चौराहे पर खेली जाती थी। युवक-युवतियों की युवाओं की अधेड़ बुजुर्गों की होली में घुमते, नाचते, गाते टुल्लर घुमाते, फाग गीत गाते ढोल-ताशे, मजीरे के साथ चलते फिरते विचित्र स्वांग, रंग-बिरंगे अजब-गजब से चेहरे गुलाबी, केसरिया, हरा, बैंगनी, लाल-पीले-नीले चेहरे, कुछ काले, पेंट से रंगें-पुते से चेहरे-मोहरे और दर्शनार्थी भी इनको देख इनकी मस्ती का आनंद उठाते, बच्चे भी पिचकारियां छोड़ते, लोगों को भिगोकर मस्ती करते, रंग भरे गुब्बारे निशाना लगाकर शिकार करते और हो-हल्ला कर मस्तीखोर सी मौज करते हैं।

पुराने समय की होलियों की बात भी यादें भी आनंद विभोर कर देती हैं। महिने भर पहले से तैयारी, स्कूलों, बाजारों में पहले से ही होली की चहल-पहल व चंदा मांगने के साथ, कंडे, लकड़ियां, संटियां इकट्ठा करना, होली संजाना, पूजा करना, दिन-रात होली के फिल्मी गानों का भोंगों पर आनंद, रातभर घूमना, साईकिल चलाना, रात को पिच्चर देखना और फिर सुबह पहले होलिका दहन, रंग-गुलाल की धींगामश्ती और फिर भांग ठंडाई की महक अब भी याद आती है। अब यह स्वरूप बदल सा गया है। इस दौर में हर किसी के साथ होली नहीं खेली जाती। होली परिचितों के साथ ही खेल सकते हैं। पता नहीं कहां टंटा फसाद हो जाये इसलिए कोई नाराज ना हो इसका खयाल रखा जाता है।

लकड़ियां भी आसानी से नहीं मिलती, महंगाई अलग और सूखी
होली जलाने की प्राथमिकता रहती हैं। यही आलम है। सूखे प्राकृतिक रंगों से बने अबीर गुलाल से होली खेलने और पानी बचाने पर जोर दिया जाता है। जो जरुरी है होली हो और मस्ती
ना हो ऐसा हो नहीं सकता। इस बार चुनावी आचार संहिता का पालन करते हुए ही होली मनाई जायेगी। वहीं आनंद और मस्ती के साथ, सुगंधित फूलों, प्राकृतिक, हर्बल रंगों के साथ, होली की हुड़दंग रे रंगरसिया की धुन – थाप के साथ नाच-गानों के साथ, मिठाई – मालपुओं व पकवानों का मजा लेकर भरपूर रुप से होली का आनंद लेने के लिए मन में सैंकड़ों उमंगें भी जोर मार रही है। होली और अपनापन यह संस्कृति अब तक चली आ रही हैं। आगे भी चलती रहेगी और यही इस देश की अनोखी पहचान भी है। हमारी यह शान आगे भी बनाए रखना है।

– मदन वर्मा ” माणिक ”
इंदौर, मध्यप्रदेश
दिनांक 26.02.2026

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