साहित्य

आदित्य यह ईश्वर की माया है

विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

प्रभु प्रार्थना से ज़्यादा ताक़तवर,
आस्था विश्वास से शक्तिशाली,
और परमपिता परमात्मा से महान,
नहीं कोई देवता है न कोई इंसान।

कभी कभी हमारा मन प्राय: एक
ठौर पर ही ठहर जाना चाहता है,
परंतु हमें भौतिक दबाव के चलते,
हर परिवर्तन स्वीकारना होता है।

परिवर्तन की ऐसी मनोदशा में
हमारे मन अवलंबन खोजते हैं,
हम अपने ईश्वर से बार – बार
संपर्क की कोशिश भी करते हैं।

अपने अपराधों के लिए मन ही
मन उससे क्षमा मांग रहे होते हैं,
उसकी चिंता भी कर रहे होते हैं,
पर उसे आभास नहीं होने देते हैं।

ये हमारी मानुषिक दुर्बलता है,
या सहज मानवीय स्वभाव है,
हमें कभी समझ नही आता है,
आदित्य यह ईश्वर की माया है।

विद्यावाचस्पति डा० कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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