साहित्य

पूर्णिका- हर्षित स्पंदित मधुमास

रजनी कटारे 'हेम'

प्रारम्भी नेह:–
खिले प्रसून पल्लवित वाटिका, सुहानी पवन सुगंधित है।
मधुप मधुकर पुंज झूम रहे, कलि-कलि खिल स्पंदित है।१।

मलय पर्वत से आई मदमस्त, मारुत लेती झकझोरें है।
चंचल- चितवन- चपला, बहक रहा मन हो उत्कंठित है।२।

आम्र तरुवर कोयलिया काली, कानों में मधुरस घोले।
आया मधुमास- सुहावन, राग- रागिनी से जग- वंदित है।३।

पुष्प महके गुल बकावली, मधुर तान छेड़ती पुरवाई।
नयनों में नीर भरे वनिता, व्यथित हृदय सुख वंचित है।४।

राग- रागिनी विरही को तड़पाए, अंतस ज्वाला धधके।
अजहुँ आए नहीं प्रियतम, खुशी नहीं हर्षित- मंडित है।५।

निर्मल निश्चल निस्तब्ध बहे, तट- तटनी तरंगिणी धार।
पंछी- वृंद चहचहा रहे, पल्लवित- पादप अनुरंजित है।६।

परिचयी नेह:–
शब्द- शब्द हो सृजित ‘हेम’, रचते रचना भाव उकरते।
अंकित टंकित वरक दर वरक, किया सबको अचंभित है।७।

पूर्णिकाकार- रजनी कटारे ‘हेम’
जबलपुर म. प्र.

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