साहित्य

बहे प्रेम का धार

डॉ गीता पांडेय "अपराजिता"

मन उपवन खिल कर मुस्काए, सौरभ बिखरे जीवन में।
बहे प्रेम की धार धरा पर, खुशी बसी हो नैनन में ॥

हास न नैतिक मूल्यों का हो, बच्चों में संस्कार भरें।
नशा व्यसन से दूर रहे वो, सबका ही सम्मान करें।
नेक राह पर कदम बढ़ाए, नेह भरा हो दामन में।
बहे प्रेम _ _ _ _ _ _ _ _ _

निस दिन यही रहे अभिलाषा,आँगन गूँजे किलकारी।
धरती का बनकर के सम्बल,महकायें दुनिया सारी॥
सुख का सूरज चमके हरपल, शुभ विचार हो जन-जन में।
बहे प्रेम_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

नौनिहाल यदि बिगड़ गए तो, बुरा देश का हाल रहे।
सदा सँवारो इनको ऐसे, दुश्मन का ये काल रहे॥
भरी वीरता रग रग में हो, बसी प्रीत हो निज तन में।
बहे प्रेम_ _ _ _ _ _ _ _ _

अपने हिस्से की खुशियाँ दे, पूर्ण करे इनके सपने।
भाईचारा पनपे जग में, समरसता का भाव बने।
मिलकर झूमे करें न मस्ती, आदत डालो बचपन में।
बहे प्रेम_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

ऐसा ज्ञान प्रदान करो तुम, जग सारा लोहा माने।
धर्म हमारा कहता प्रतिपल, पर पीड़ा को अपनी जाने॥
विकट समस्या हल हो जाए,बूँद-बूँद के संचयन में।
बहे प्रेम_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

धैर्य समर्पण कर्मठता से, लक्ष्य सिद्धि मिल जाती है।
जैसे कोयल बैठ साख पर,मधु संगीत सुनाती है॥
गागर में सागर भर जाए ,पहुँचे जो
अंतर्मन में।
बहे प्रेम————-

डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश
94 15 718838

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