
कल मौसम फिर करवट बदलेगा,
सूर्य ऊष्मा धरती पर फैलाएगा।
सरसों कुसुमित हो हँसी बिखेरेगी,
खेत-खलिहान में बसंत झूमेगा गाएगा।
मंदिर-देवालय अबीर से रंग जाएंगे,
जब चौपालों में ढोल की थाप गूँजेगी।
फागुन की पुरवाई रंग बिखराये,
होली की धुन से धड़कन धड़केगी।
जन पर उतरेगा सांकेतिक बसंत,
पीत रंग से सौंदर्य का उफान रहेगा।
कहीं कोई प्रेयसी यादों में डूबेगी,
प्रेम प्रणय का मधुमास महकेगा।
रंग, रीत, प्रीत ये रिश्तों का उत्सव है,
स्मृतियों में अपनो का सान्निध्य है।
पीत धूप में मन खिलकर मुस्काएगा,
बसंत प्रेम बन जीवन में लौट आएगा।
सुमन बिष्ट, नोएडा




