साहित्य

फागुन

एक यह फागुन है
किसके संग खेलूं मैं होली,
रंग हुये सारे बेरंग,
जिंदगी के ,
जल गये थे सारे अरमान,
संग उनके,
किसके संग खेलूं मैं होली ,
आज भी ….,
उभरता है अक्स उनका,
उन उड़ते हुए ग़ुलाल में,
दूर खड़ी देखती हूँ मै,
तब …..,जबकि
उतरी नहीं थी मेहंदी,
हाथों की मेरी -और,
खनकती थी चूड़ियाँ,
हाथों में मेरे,
वहीं ..,चमक रही थी,
पैरों में महावर -और,
बजती थी पायल,
हर आहट पर उनके,
खेलूँगी होली संग पिया के अपने,
फूट रहे थे अरमा प्यार भरे,
दिल में ,
पर ….,
वो तो बड़े सरताज निकले,
खेली होली अपने ही लहू से,
और आ गये ओढ़ कर तिरंगे को,
खेलने को संग मेरे आखिरी होली,
किसके संग खेलूं मैं अपनी होली ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
©स्वरचित मौलिक रचना
23-02-2026

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