
अधरों पर गीत सजे जबहीं,
समझो तब फागुन आ धमका।
मन के अँगना सुरताल बजे,
तब ताल तरंगित हो चमका॥
मनभावन के घर चंग बजा,
रसिया मुख रंगत है दमका।
चितचोर सुहावन है लगता,
खुशबू हर अंग तभी गमका॥
अब धूम मची सगरी नगरी,
सखियाँ विहँसें सब रंग लगा।
चहुँओर धमाल मचा ब्रज में,
लगते सबलोग सुदीप सगा॥
इस रंग भरी फगुनाहट में,
सब लोग दिखे मदमस्त जगा।
फगुआ चढ़ के सर बोल रहा,
सब मस्त लगे रस रंग पगा॥
मन के अँगना इसराज सजे,
हृद तार तरन्नुम में बजते।
गलबाँह डले सजना-सजनी,
मधुराधर में सुर से सजते॥
अब प्रीति सुरीति बसा पुर में ,
सब बैर मिटा कड़वा तजते।
सुविचार सदा फलते जग में,
हरि नाम सदा उर में भजते॥
डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




