
गली – गली हुड़दंग मचा है।
रंग बिना अब कौन बचा है।।
शोर करे बच्चे अब सारे।
भर पिचकारी सब पर मारे।।
निकल गई बच्चों की टोली।
इक दूजे के बन हमजोली।।
गुब्बारों को भर कर मारे।
मस्ती में झूमे ये सारे।।
पूआ गुझिया खाकर निकले।
हुड़दंगी ये सब हैं फिसले।।
जात पात का भेद नहीं है।
सतरंगी सी गंग बही है।।
ढप लेकर जब ताऊ निकले।
बड़े – बड़ों की नजरें फिसले।।
आज सभी पर मस्ती छाई।
देवर हो या हो भौजाई।।
साजन का भी मन है मचले।
सास कहे बहु थोड़ा बचले।।
भंग पीकर यह इतना बहका।
सजनी का भी दिल है धड़का।।
पर्व बड़ा यह है हुड़दंगी।
रंगे हुए सब साथी संगी ।।
हुड़ियारो से कौन बचाए।
फूहड़ गाने आज बजाए।।
नीलम अग्रवाल रत्न
🙏🙏




