साहित्य

हरी-हरी नोटों का चमत्कार–हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति 'जय'

मैं मिश्रीलाल लिखने वाला घूस तो दे नहीं सकता। हाथ जोड़ विनती कर सकता हूँ। मैं विनम्रता पूर्वक एक अधिकारी से मिला। हाथ में हरी-हरी नोट ले लिया था। सुना था हरी-हरी नोट देखकर अधिकारी महोदय बड़े नरम स्वभाव के हो जाते हैं। रुका काम सरक जाता है।

इसके पहले भी मिला था। तब हरी-हरी नोट नहीं लिया था। सरकारी आदमी पर पूरा भरोसा था। काम लटक गया। खूब चक्कर लगाये। ईमानदारी के बल पर। जिस तरह से कुत्ते की पूंछ पर चाहे जितना तेल लगाकर सीधा करिये वह पूंछ पुनः वैसे ही हो जाती है। उसी तरह से अधिकारियो को खूब तेल मालिश की लेकिन अधिकारी टेढ़ा का टेढ़ा ही रहा। एक इंच काम नहीं किया।

एक सज्जन समझाये कि आपकी कलम घिसते-घिसते जैसे घिस जाती है वैसे अधिकारी के पास आते-आते चप्पल तक घिस जायेगी। कुछ दिखाओ हरा-हरा,लाल-लाल।

हम समझ गये कि हमारा काम काहे नही सरक रहा है। अनुनय-विनय सब फेल। अधिकारी का बाल बांका नहीं कर सका। जो अधिकारी मिश्रीलाल के सामने नहीं झुका आज वह अधिकारी हरी-हरी, लाल-लाल नोट पाकर मिश्रीलाल के सामने नतमस्तक हो गया।

लक्ष्मी देखकर छोटे-छोटे अधिकारी क्या यहाँ तो बड़े-बड़े अधिकारी का मौन व्रत टूट जाता है। हरी-हरी नोट देखकर मुंह से लार टपकने लगती है। उसने मुझसे वादा करते हुए कहा आपका समस्त काम हो जायेगा।

जिस काम के लिए कई साल बीत गया। जवानी बीत गयी। कई चप्पले घिस गयी। कई जोड़ी जूते के तलवे टूट कर बिखर गये। बिन खाये चक्कर लगाते रहे। हाथ जोड़ विनती करते रहे लेकिन अधिकारी महोदय का ह्रदय तक नहीं पिघला लेकिन हरी-हरी, लाल-लाल नोटों के चमत्कार से मेरा अटका-लटका काम अपनी पूर्णता प्राप्त कर ली।

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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