
झुठे के घर पे लगी है खुशी की मेला
सत्य घर पे बैठा है मौन बन अकेला
ये कैसा दिन दिखलाया तुँने दिनमान
कैसे जयेगें जग में सच्चे इन्सान
झुठे का मुँह तब हो जाता है। काला
जब पड़ जाता है इनका सत्य से पाला
फिर भी क्यूँ तुम्हें शर्म ना आती श्रीमान
कितना गिरा दिया अपनी स्तर रे बेईमान
झुठे के बस्ती में मक्कार बना है पंच
सत्य की कस्बा में में अंधकार का मंच
कैसी विधि की रचना कर दी है विधान
सत्य जगत में है सबसे ही आज परेशान
झुठे के दर पे हो रही जीत की जयकार
सत्य के पंगत में बैठा साथी है शर्मसार
किस बात की सजा दे रहे हो भगवान
अकड़ कर चलता फिरता है यहाँ शौतान
झुठे का बनता है सब जग में यहाँ साथी
जैसे जलता है दीपक के संग संग बाती
झुठे की झोली में मिलता है अब अनुदान
सत्य जगत से हो रहा है तेजी से गुमनाम
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




