
नवरात्री के दिनों में ये दूसरा दिन ब्रहाचारिणी देवी के अवतारका प्रतीक है ।इनके अवतार का अर्थ ही तप का आचरण करने वाली देवी से है ।इनके दाएं हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है ।चेहरे पर शांति और धैर्य की चमक होती है।
जब देवी ने हिमालय की पुत्री रूप में जन्म लिया। शंकर भगवान जी को पति रूप में पाने की इच्छा से हजारों वर्षों तक तपस्या की। उनके तपस्वी रुप को ब्रहाचारिणी देवी कहा गया है। भोग देवी ब्रहाचारिणी को शक्कर का भोग लगाया जाता है।
मंत्र *या देवी सर्वभूतेषु ब्रहाचारिणी रुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
दधाना कर मधाभ्याम अक्षमाला कमण्डलू
देवी प्रसीदतु मयि ब्रहाचारिण्यंनुत्तमा।।
प्रिया काम्बोज ✍️ सहारनपुर उत्तर प्रदेश




