साहित्य

जीवन मरण का खेल है जीवन

कुलदीप सिंह रुहेला

जीवन मरण का खेल है जीवन, आना-जाना मेला है,
आज खिला जो फूल यहाँ, कल उसका ही झमेला है।

हँसते-हँसते दिन ढलते हैं, रोकर क्या पाया है?
साँसों की इस पतंग को बस कर्मों ने थामाया है।

कभी धूप का ताज सजा है, कभी छाँव की चादर,
कभी जीत का ढोल बजे, कभी हार का है समंदर।

समय यहाँ का सख्त गुरु है, हर पल पाठ पढ़ाता,
जो गिरकर फिर उठ जाता है, वही मुकुट पहन पाता।

मृत्यु नहीं है अंत कहानी, बस इक पन्ना मुड़ता है,
जीवन अपनी नई किताब में फिर से आगे बढ़ता है।

तो डर किस बात का प्यारे, जब नियम यही प्राचीन—
जीवन मरण का खेल है जीवन, खेलो इसे रंगीन।

हँसकर जी लो हर इक क्षण को, यही सच्चा उत्सव है,
जो आज मिला है बाँट दो, यही असली गौरव है।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश म

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