साहित्य

सारदा मईया के समरपित एगो गीत

पं.अपूर्व नारायण तिवारी 'बनारसी बाबू'

(टेक)
सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल,

माँ सारदा से ग्यान धरती पे आयल

वीणा के झंकार से सभे केहू झंकृत,

हे सारदे भवानी ! ग्यान दीप छायल

सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल…

(अंतरा 1)
सुफेद हौ ओढ़नी,हंसवाहिनी बिराजैं,

ग्यान के देवी, अवतरन दिवस साजैं

ब्रह्मपुरी में ब्रह्मनाद अस होवे लागल,

माई असीस से तम अनिहार भागल

सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल…

(अंतरा 2)
बुद्धि के देवी, ग्यान के सागर मइया,

हमनी के तारनहार माई हौ खेवइया

बिना सुरसति माई पार न लागे नैया,

भगति में हमनी सभै लीन हईं मइया

सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल…

(अंतरा 3)
बेद-पुरान सभे सारदा स्तृति गावैं,

सुर-ताल, छंद, कविता सभे पावैं

हे सारदे माई ! विद्या के वरदान दS,

मुढ़ के अकल में,ग्यान के उजास दS

सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल…

(अंतिम)
वीणा के झंकार से सभे केहू झंकृत,

हे सारदे भवानी ! ग्यान दीप छायल

सुनऽ हो मीतवा ! आजु मंगल दिनवा आयल…
©पं.अपूर्व नारायण तिवारी ‘बनारसी बाबू’✍️सर्वाधिकार सुरक्षित
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