साहित्य

झुठा है ये प्रेम संसार

उदय किशोर साह

इश्क की चक्कर में हो गई मेरी बरबादी
बेवफा ने कर ली गैरों से    अपनी शादी
राजनीति की तरह हो गई     भीतरघात
शहनाई बजने से पहले पक्षी हुई आजाद

मोहब्बत ने क्या क्या हमें रंग  दिखलाया
प्रेम की रूत था पर पतझड़ पे है  गिराया
कैसी प्रीत से किया था मैं संगत      साथ
खुशियां मांगी थी गम आ गई मेरे     पास

मोहब्बत की रीत है जग में गजब निराली
दिन होता है काला काला रात भी है काली
बिन बुलाये मेहमान बन गई अब।   तन्हाई
जन्नत के बदले जहन्नुम  गले पड़       आई

प्रेम जगत में बन गई आज स्वार्थ का बाजार
दौलत की भूखी है जो    स्वार्थ में है  लाचार
घर बसाने की आरजू में छुटा सारा   परिवार
झुठी है कसमें वादे झुठा है प्रेम का ये संसार

प्यार जगत में अब      भूल कर भी ना है   करना
प्रेम मेहब्बत की चक्कर   में भाई ना कभी पड़ना
मृगतृष्णा का होता है  ये प्रेम मोहब्बत की व्यापार
उजड़ गये है कितने मजनूं का अच्छा खासा संसार

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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