आलेख

माँ काली के भक्त से परमहंस तक का सफर

महेन्द्र तिवारी

जन्म दिवस विशेष 
रामकृष्ण परमहंस का जीवन भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की एक अमूल्य धरोहर है। 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के किनारे बसे छोटे से ग्रामीण क्षेत्र कामारपुकुर में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय एक गरीब लेकिन धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जो गाँव में पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों से जुड़े रहते थे। माता चंद्रमणि देवी भी परम भक्तिमयी स्त्री थीं, जिनकी गोद में बालक गदाधर—रामकृष्ण का बाल नाम—को बचपन से ही ईश्वरीय ज्योति प्राप्त हुई। गदाधर बचपन से ही असामान्य थे। वे सामान्य बाल लीला में कम रुचि रखते थे और अधिकतर वन-उपवन में भगवान के दर्शन में लीन रहते। गाँव के लोगों को अक्सर देखते कि वे पेड़ों की डालियों पर चढ़कर नाचते-गाते या मिट्टी के रूप में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करते। एक बार होली के अवसर पर वे श्रीकृष्ण भक्ति में इतने तल्लीन हो गए कि नाचते-नाचते सामाधि की अवस्था में चले गए, जिससे गाँव वाले आश्चर्यचकित रह गए। इस घटना ने उनके आध्यात्मिक गुणों का प्रारंभिक परिचय दिया।
कामारपुकुर से मात्र छह वर्ष की आयु में वे पिता के निधन के बाद भी आनंदमय रहते। किशोरावस्था में वे भाई रामकुमार के साथ पश्चिमी बंगाल के दक्षिणेश्वर पहुँचे। दक्षिणेश्वर काली मंदिर, जो रानी रासमणि द्वारा निर्मित एक भव्य स्थल था, हुगली नदी के तट पर स्थित है। यहाँ नवनिर्मित काली मंदिर में रामकुमार पुजारी थे। गदाधर ने भी पूजा-अर्चना में सहायता की। धीरे-धीरे वे मंदिर के मुख्य पूजारी बन गए। माँ काली के प्रति उनकी भक्ति अथाह थी। वे मंदिर में पहुँचते ही माँ के चरणों में सिर झुकाते और घंटों भजन-कीर्तन में लीन हो जाते। एक बार उन्होंने माँ काली से भोजन माँगा तो माँ ने स्वयं भोजन परोस दिया। ऐसी अनेक लीलाएँ उनके जीवन में घटित हुईं, जो सिद्ध संत के प्रमाण हैं। रामकृष्ण को माँ काली के दर्शन हुए। वे कहते, “माँ काली मेरी माँ हैं, वे मुझे भोजन कराती हैं, स्नान कराती हैं।” उनकी साधना इतनी तीव्र थी कि वे रात-दिन माँ के चिंतन में रहते। कभी-कभी वे मंदिर छोड़कर जंगल में चले जाते और पेड़ों पर चढ़कर माँ को पुकारते। इस तीव्र साधना से वे शारीरिक रूप से दुर्बल हो गए, लेकिन आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छू लिया।
रामकृष्ण की आध्यात्मिक यात्रा विविध मार्गों से होकर गुजरी। प्रथम वे शाक्त साधना में लीन हुए। भैरवी ब्राह्मणी नामक एक विदुषी साधिका उनके पास पहुँचीं और उन्हें तंत्र साधना का उपदेश दिया। उन्होंने चण्डी पाठ, देवी महात्म्य का पाठ किया और श्मशान साधना में प्रवेश किया। श्मशान में साधना करते हुए उन्हें अनेक सिद्धियाँ प्राप्त हुईं, किंतु वे कभी उनका उपयोग नहीं किया। इसके पश्चात् उन्होंने वैष्णव साधना अपनाई। राधा-कृष्ण भक्ति में वे इतने तल्लीन हुए कि स्वयं को राधा समझने लगे। वे कहते, “मैं राधा हूँ, गोपियों में एक गोपी।” इस साधना से उन्हें विराट रास का दर्शन हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने इस्लाम धर्म का अभ्यास किया। एक सूफी संत के मार्गदर्शन में उन्होंने अल्लाह का स्मरण किया और अल्लाह का दर्शन प्राप्त किया। ईसाई धर्म की साधना में बाइबिल पढ़ी और जीसस क्राइस्ट का दर्शन हुआ। अंत में तोतापुरी नामक नगा साधु उनके पास आए। तोतापुरी ने उन्हें अद्वैत वेदांत का उपदेश दिया। रामकृष्ण ने पंचवटी में निराकार ब्रह्म की साधना की। तोतापुरी ने कहा, “यह काली रूपी अज्ञान को काट डालो।” रामकृष्ण ने नेत्र बंद कर निराकार सत्य को देखा। परंतु माँ काली के प्रति प्रेम के कारण नेत्र खुलते ही माँ दिखीं। तोतापुरी ने ६ दिनों तक प्रयास किया और अंत में रामकृष्ण को समाधि प्राप्त हुई। इस प्रकार उन्होंने सभी धर्मों का साधना कर एक ही परम सत्य की प्राप्ति की। उनका प्रसिद्ध कथन है, “जितने मत, तितने पथ।” अर्थात् जितने मत हैं, उतने ही मार्ग ईश्वर तक पहुँचने के। वे कहते, “जैसे विभिन्न नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे सभी धर्म ईश्वर तक पहुँचाते हैं।”
रामकृष्ण का व्यक्तिगत जीवन भी आध्यात्मिकता से परिपूर्ण था। उनका विवाह सारदा देवी से हुआ, जो मात्र ५ वर्ष की थीं। विवाह मात्र नाममात्र का था। सारदा देवी बाद में उनकी आध्यात्मिक सहधर्मिणी बनीं और रामकृष्ण मिशन में माँ शारदा के रूप में पूजनीय हुईं। रामकृष्ण कहते, “सारदा मेरी शक्ति हैं।” वे गृहस्थ जीवन में रहते हुए संन्यासी के समान ब्रह्मचर्य का पालन करते। उनके भतीजे ह्रदय ने उनके दैनिक कार्यों में सहायता की। रामकृष्ण को भक्तों के बीच भवसमाधि की अवस्था आ जाती। भवसमाधि में वे ईश्वरानुभूति में डूब जाते। केशव चंद्र सेन जैसे ब्रह्म समाज के विद्वान उनके दर्शन को आते। रामकृष्ण ब्रह्म समाज को प्रेम पूर्वक उपदेश देते। वे कहते, “भगवान भक्ति के बिना ज्ञान नहीं।” उनके उपदेश सरल, ग्रामीण भाषा में होते, किंतु गहन अर्थपूर्ण। वे कहानियों, दृष्टांतों से समझाते। जैसे, “मछली जाल में फँस जाती है, किंतु पानी को कभी नहीं छोड़ती। वैसे भक्त संसार के जाल में फँसकर भी ईश्वर को नहीं छोड़ता।”
रामकृष्ण के जीवन में विवेकानंद का आगमन एक महत्वपूर्ण घटना थी। नरेंद्रनाथ दत्त नामक युवा, जो ब्रह्म समाज से जुड़े थे, उनके पास संशय लेकर आए। रामकृष्ण ने कहा, “हाँ, ईश्वर हैं।” धीरे-धीरे नरेंद्र उनके प्रमुख शिष्य बने। रामकृष्ण ने उन्हें संन्यास का उपदेश दिया। अन्य शिष्य जैसे राकहल, बाबुराम, निरंजनानंद आदि भी उनके चरणों में बैठे। रामकृष्ण ने कहा, “मेरे शिष्य जगत के कल्याण के लिए जन्मे हैं।” 1885 में उन्हें गले का कर्करोग हुआ। वे कोसिपुर उद्यान बारी में रहे। वहाँ भक्तों ने सेवा की। अंतिम दिनों में वे शिष्यों को उपदेश देते रहे। 16 अगस्त 1886 को वे महासमाधि को प्राप्त हुए। मृत्यु से पूर्व उन्होंने विवेकानंद को मिशन का उत्तराधिकारी बनाया।
रामकृष्ण की विरासत रामकृष्ण मिशन के रूप में आज विश्वव्यापी है। स्वामी विवेकानंद ने 1897 में इसकी स्थापना की। मिशन शिक्षा, चिकित्सा, आपदा राहत, ग्रामीण विकास में सक्रिय है। रामकृष्ण मठ विश्व भर में हैं। उनके उपदेश ‘श्री रामकृष्ण कथामृत’ में संकलित हैं, जो महेंद्रनाथ गुप्त (श्रीम) द्वारा लिखित है। यह ग्रंथ उनके संवादों का संग्रह है। रामकृष्ण ने वेदांत को आधुनिक रूप दिया। वे कहते, “नर से नारायण बनना।” अर्थात् मनुष्य को ईश्वर प्रकट करना। उनके विचार सभी धर्मों के प्रति समावेशी हैं। आज के विभाजित समाज में उनकी एकता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महापुरुष उनके अनुयायी रहे। विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद में रामकृष्ण के संदेश को विश्व पटल पर पहुँचाया। रामकृष्ण का जीवन प्रमाणित करता है कि सच्ची साधना सीमाओं से परे होती है। वे न तो विद्वान थे, न लेखक, किंतु उनके हृदय से निकले वचन अमर हैं।
उनके कुछ प्रमुख वचन हैं— “भगवान को पाने के लिए भूखे श्वान की भाँति रोओ।” “ईश्वर भजन के बिना नहीं मिलते।” “स्त्री जाति को देवी समझो।” “जो कामना रहित है, वही सच्चा भक्त।” रामकृष्ण का जीवन एक दर्पण है, जो हमें आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। वे कहते, “मैं कोई अवतार नहीं, केवल भक्त हूँ।” किंतु उनके अनुयायी उन्हें अवतार मानते। दक्षिणेश्वर काली मंदिर आज तीर्थस्थल है। वहाँ उनके चित्र से दर्शन होते हैं। कामारपुकुर में जन्मभूमि मंदिर है। विश्व भर में रामकृष्ण जयंती धूमधाम से मनाई जाती। उनके जीवन से हम सीखते हैं कि भक्ति, ज्ञान, कर्म सभी मार्ग ईश्वर तक ले जाते। आज के भौतिकवादी युग में रामकृष्ण का संदेश आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है। उनका जीवन सिद्ध करता है कि साधारण मनुष्य भी परम सत्य प्राप्त कर सकता है। रामकृष्ण परमहंस अमर हैं।

*महेन्द्र तिवारी, दिल्ली*

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