साहित्य

खिलने लगा वसंत

डॉ अर्जुन गुप्ता 'गुंजन'

मनभावन मधुमास मनोहर, सुरभित सभी दिगंत।
वसुधा का आँचल इठलाता, खिलने लगा वसंत॥

हरियाली की डोली उतरी, चहुँदिश व्याप्त सुगंध।
धूप मखमली का दिनकर से,हुआ अमिट अनुबंध॥
ऋतु संक्रमण की बेला है, हुआ शिशिर का अंत।
वसुधा का आँचल इठलाता, खिलने लगा वसंत॥

रति का पति अब वाण चलाता,काम पिपासु अनंग।
नित यौवन करती अठखेली, चढ़ा फाल्गुनी रंग॥
विरह वेदना में व्याकुल मन, दूर गए हैं कंत।
वसुधा का आँचल इठलाता, खिलने लगा वसंत॥

अमराई‌ में कोयल बोले, भ्रमर डोलता बाग।
मधुरिम मौसम ने दस्तक दी, गाते हैं सब फाग॥
पीली सरसों की बगिया ने, हिय में भरे उमंग।
वसुधा का आँचल इठलाता, खिलने लगा वसंत॥

लाल रंग की चूनर ओढ़े, आया पुहुप पलास।
कलियों नें मकरंद घोल दी, चहुँदिश है उल्लास॥
कली-कली पर भ्रमर डोलता, खुशियाँ हुई अनंत।
वसुधा का आँचल इठलाता, खिलने लगा वसंत॥

© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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