
बिन करुणा के मानुष केवल माटी की एक काया है,
जिसने प्रेम न बांटा जग में उसने सब कुछ गंवाया है।
रिश्तो की यह डोर अधूरी बिन ममता के सब सुना,
मानवता के बिन जीवन है केवल दुखों का कोना।
हृदय शून्य जो पीर न जाने, वह पत्थर सा होता है,
सेवा भाव न रखने वाला, अपनी खुशियां कोटा है।
परोपकार की राह ताज़े तो, व्यर्थ यहां हर स्वांस है,
इंसानियत ही इस दुनिया की सच्ची और अंतिम आस है।
धन दौलत के महल खड़े हो मन में श्रद्धा भाव न हो,
जीवन बोझिर हो जाता है घर करुणा का अभाव हो।
मानता ही धर्म श्रेष्ठ है जीवन का आधार वही,
जिसके भीतर प्रेम नहीं है वह इंसान बेकार ही।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



