
मै स्त्री हूंँ ….
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरुष होने पर ,
मैं झुकती हूंँ
तभी तो ऊंँचा उठ पाता है तुम्हारे अहंकार का आकाश ।
मै सिसकती हूंँ
—तभी तो तुम मुझ पर कर पाते हो अट्टहास ,
मैं व्यवस्थित हूंँ,
इसीलिए तो रहते हो तुम अस्त व्यस्त ,
मै मर्यादित हूंँ
इसीलिए तुम लांँघ जाते हो सारी सीमाएं ,
स्त्री हूंँ मैं,
हो सकती हूंँ पुरुष भी, पर नही होती ,
रहती हूँ स्त्री ,
इसलिये ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरुषत्व,
मेरी ही नम्रता से पलता तुम्हारा पौरुष ,
मै समर्पित हूंँ,
इसीलिए हूंँ उपेक्षित औ तिरस्कृत,
त्यागती हूंँ अपना स्वाभिमान, ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान।
सुनो, मैं नही व्यर्थ
मेरे बिना भी तुम्हारा नही कोई अर्थ।
मैं स्त्री हूंँ न
यही तो है सत्य।।
सुषमा श्रीवास्तव,रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




