साहित्य

अवांछित ( कहानी )

वीणा गुप्त

जैसे  ही फोन की बैल बजी, दर्शन का माथा ठनक गया। जरूर पिताजी को –।   सुबह चार बजे आने वाला फोन किसी अनहोनी  की ओर संकेत कर रहा था। वैसे भी दर्शन और उसके भाई- भतीजे इस के खबर  के लिए पूरी तरह तैयार  थे। तैयार क्या बल्कि ईश्वर से दुआ कर रहे थे कि जल्दी ही पिताजी को इन कष्टों से मुक्ति  मिले। अब यह बात अलग थी कि पिताजी  के साथ साथ उन सबको भी उनकी सेवा -टहल, इलाज के खर्चों और एक अनकहे अपराध- बोध से मुक्ति  मिल जाती। बड़े भैया का पोता  सी.ए की तैयारी  कर रहा था। पोती एम, एस ,सी, फाईनल में  थी। पढ़ने के लिए अलग कमरे की ज़रूरत थी और घर का एक अच्छा -खासा कमरा पिताजी ने घेरा हुआ था। यह दूसरी बात है, यह घर पिताजी ने ही अपनी  मेहनत की  कमाई से बन वाया था ताकि  बुढा़पे में  सिर पर छत बनी रहे । ये सभी बातें पल भर में  ही दरशन के मन में कौंध गई।

फोन उठाया तो उसकी आशंका सही  निकली। बड़े भैया ने रोते- रोते  पिताजी के स्वर्गवास की सूचना दी। “क्या हो गया था उन्हें? ” अचानक दर्शन के मुँह से औपचारिकता- वश निकल गया। वह अच्छी तरह जानता था कि पिताजी केवल बुढ़ापे के शिकार  थे। अम्मा के चल बसने के बाद  प्यार और देख भाल के लिए  तरस रहे थे ।अपने  ही घर में  अवांछित  थे। और इसी उपेक्षा से डिप्रेशन में थे।  “कुछ नहीं  जी, रात को भले -चंगे थे।  खाना- वाना खाकर जो सोए, तो बस उठे—।”बड़े भैया की आवाज फिर रोने में बदल गई। “आप हौंसला रखो जी। आपने तो अपनी तरफ से  सेवा- इलाज में  कोई कसर नहीं  रखी। हम आ रहे  हैं।” फोन बंद करने के बाद दरशन खुद ही हैरान हो गया। उसके  मुंँह से  इतना बडा झूठ कैसे निकल गया। सब जानते थे कि पिताजी के डिप्रेशन का कोई इलाज नहीं  हो रहा था। उनके खाने -पीने पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा था। वे आवाजें देते रहते ,कोई बेटा -बहू ,पोता -पोती पास नहीं  फटकता। कभी -कभी नौकर आकर कह जाता “काहे को शोर मचा रहे हो बाबूजी। रखा तो है आपका पानी मेज पर। ” बस सब उनसे छुटकारा पाना चाहते  थे।
अभी महीने भर पहले की ही तो बात है ।बड़ी भाभी का फोन आया था। वे उसकी पत्नी से कह रही थीं ,”कि बुढ़ऊ ने तो दुखी कर दिया है। दिन -भर आवाजें लगा – लगा कर सबकी नाक में दम करते रहते हैं। कभी कोई आ जाता है हाल- चाल पूछने, तो कभी कोई। दिन भर चाय -पानी का बखेड़ा फैला रहता है। बहुत कर लिया हमने। अब और नहीं  होता हमसे। अब भई, बाकी के बेटे संभालें ।उनका भी तो कोई फ़र्ज है कि नहीं। अब तुम इन्हें  यहाँ से ले ही  जाओ। नहीं तो हम ही पटक जाएंगे इन्हें तुम्हारे यहाँ।” पत्नी  ने  दरशन को बताया। वह भी सुनकर चुप हो गया।
आज से कई बरस पहले ,जब अम्मा जीवित थीं, उसने अम्मा- पिताजी को अपने घर रखने की बात की थी ,तो तब इन्होंने ही मना कर दिया था। ऐसा करने के कई कारण थे। अम्मा पूरी गृहस्थी  संभाल लेती थीं। बड़ी भाभी को घर के धंधों से पूरा छुटकारा  मिल जाता। उन्हें  अपने साथ न रखने पर बड़े भैया को पिताजी की मोटी पेंशन- राशि  अपने  हाथ से निकलती नजर आ रही थी। कहीं पिताजी को बहला फुसला कर,कोई दूसरा भाई उनकी जमीन जायदाद न हड़प ले, यह बात भी उनके मन में  थी  और यही सच था। पिताजी ने अपनी जायदाद का काफी हिस्सा और जमा पूँजी,बाकी बेटों को बिना बताए, बड़े भाई के नाम कर दी थी। बाकी के भाई  इस बारे में  दोनों को आड़े हाथों लेना चाह ही रहे थे,कि पिताजी बीमार हो गए। और अब  बड़े भैया  उनकी जिम्मेदारी से छुटकारा चाहते  थे।
दरशन ने अपने तीन छोटे भाइयों से भी पिताजी की गिरती सेहत और उनकी देख भाल के  विषय में  बात की थी,पर सब  बेकार। कोई इस बारे में सुनने -सोचने को भी तैयार  नहीं  था। दरशन भी अपने भाइयों  जैसा ही था। पिताजी के पाँच- पाँच सपूतों के घरों में  पिता के लिए  कोई जगह नहीं  थी। खैर, अब तो समस्या  का स्थायी  समाधान हो गया था। पिताजी ने अपने  लिए  खुद जगह तलाश ली थी।
सुबह होते ही सारे भाई अपनी पत्नियों  समेत
पहुँच गए। बड़ा करुण दृश्य था।  हर कोई रोने का दिखावा करने में  एक दूसरे से बाजी मार लेना चाहता था। उनकी बातों  से मृत पिता के प्रति अपार सम्मान  झलक रहा था।
“हमारे तो घर की रौनक ही चली गई। पिताजी थे, तो  घर में आया- गया रहता था। घर पर उनका आशीर्वाद  था।” बड़ी भाभी न जाने  किस रिश्तेदारिन से बड़े गमगीन लह़जे में बात कर रही थी। बार- बार उनका गला भर आता। दर्शन  की पत्नी  ने इशारे से पति को महीने भर पुरानी वह बात याद दिलाई जो भाभी ने उससे  फोन पर  की थी और फिर वह भी चश्मा उतार आँसू पोंछने  का दिखावा करने लगी।
हाँ , दरशन की आँख में एक भी आंँसू नहीं आया वह चुप बैठा, सब देख -सुन रहा था।

“बेचारे को बाप की मौत से सदमा लगा है। रो भी नहीं  पा रहा है। धीरज रखो भाई ,जो होना था हो गया। ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चलती है ।” लोग आते,ऐसी ही बातें करते, उसकी पीठ सहलाते और निकल जाते। दरशन और उसके भाई हाथ जोड़ देते ।
दरशन के मन में अपराध-बोध जरूर था। पर क्या फायदा ऐसे अपराध बोध का , जिससे बचने का कोई उपाय न किया जाए।
दरशन सोच रहा था कि हम लोग ऐसी बातें कैसे कर लेते हैं और झूठ का इतना बड़ा पाखंड अपने इर्द -गिर्द कैसे रच लेते हैं। हमें इस पर कोई लाज क्यों नहीं आती? क्या हम इस दोगलेपन को दिखाए  बिना मृत्यु को स्वीकार नहीं  सकते? अनेक प्रश्न उसके मन को मथ रहे थे कि बड़े भैया ने उसे  इशारे से बुलाया।

बोले,” पंड़ित जी कह रहे हैं ,पोते- पड़पोतों वाला गया है, इनका तो सब काम खूब  धूम -धाम से होना चाहिए। तुम क्या कहते हो?”

“जैसा आप सबको  ठीक लगे ” दरशन बोला।
बाकी के भाई भी उदारता से पैसे लुटाने को तैयार थे। कैसी विडंबना थी, जीते- जी जिस पिता का सबने अवांछित समझकर तिरस्कार किया,अब
सब उसका सत्कार कर वाह- वाही लूटना चाहते  थे। ।
पिताजी का विमान निकाला गया। पूरे तेरह दिनों तक घर
में उत्सव का माहौल बना रहा। घर की महिलाओं को रसोई में न खटना पड़े, इसके लिए दो रसोइए रख लिए गए। दूर- दूर के नाते- रिश्तेदार शोक मनाने आए और अपनी ख़ातिर दारी से तृप्त हो,मृतक के सौभाग्य  और उसके श्रवण कुमार से बेटों का गुणगान करते लौटे। तेरहवीं पर ऐसा भव्य मत्यु-भोज हुआ कि लोग अब तक के सभी समारोह भूल गए।  सब जगह यही चर्चा थी कि भई भाग्य हों तों पिताजी जैसे। सपूत हों तो पिताजी के बेटों जैसे ? दरशन सोच रहा था,” काश । पिताजी को इस मान -सम्मान का जरा सा भी भाग उनके जीते जी मिला होता।”

वीणा गुप्त
नई दिल्ली
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