साहित्य

मित्रता

आत्म प्रकाश कुमार

बाग में मिलने सनम से रोज़ हम जाने लगे
देख कर अपनी मुहब्बत फूल मुस्काने लगे
खूब झाड़ा और तराशा भी हमें उस्ताद ने, इसलिए हम महफिलों में आजकल छानेलगे।
छोड़कर हमको इधर महबूब जब जाने लगा,
अंग ढीले हो गए औ” होश उड़ जाने लगे ।
दोस्तों की बेरुखी को हम समझ पाए नहीं,
बात सीधी थी मगर क्यों यारको ताने लगे। राज़ हम दिलका छिपातेभी छिपाते किस तरह, हम मिले नज़रें मिली सब राज़ खुल जाने लगे।
नफ़रतों का जाम पीकर होश रहता है किसे,
प्यार हमने है किया वह राज़ समझाने लगे।
यह हमारा ही जिगर था हम बहुत सहते रहे ,
एक दिन हमने सुनाई यार घबराने लगे ।
दोस्तों पर जां लुटाना जानते हैं हम सनम ,
इसलिए तो दोस्ती के राग हम गाने लगे। चांँद तारे सब मिलेंगे अंक में आकाश के,
हम धरा पर चांँद तारों की तरह छाने लगे। दम निकलता है हमारा देखकर दुख और का,
जब जहां मैं प्यार बांटा प्यार हम पाने लगे।
रोज़ मिलने का करें वादा मगर मिलते नहीं,
इस तरह से वह हमें हर रोज़ तड़पाने लगे।
अब सहन होती नहीं थी बेरुखी यू यार की,
बेरुखी टूटे, सनम की गाल सहलाने लगे। बचपना बीता जवानी में बुढ़ापा आ गया,
चल नहीं सकते इधर सब दांतभी जाने लगे।
काटना मुश्किल हुआअब यह बुढ़ापा क्या कहें,
दुख मिले इतने खुशी के फूल मुरझाने लगे।
ग़म सभी अब है परेशान देखकर अपना चलन,
आ गया हंसना हसाना हास्य क्लब जाने लगे

आत्म प्रकाश कुमार गान्धीनगर गुजरात।

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