
मासूम सा बचपन दिल में बैठा कर रहा है जंग,
यादों का कारवाँ हरदम चलने से हो गए हम तंग।
नजरें चुराकर कविता या कहानी कहाँ पूरी होती,
मन में टीस उठती सपने सा सबकुछ करुं अर्पण।
मेरे दिल पर अब हमेशा तेरा ही जोर चलता है,
कभी अधूरा सा तो कभी पूरा सा लगता है।
माँ का आँचल और पिता का प्यार नज़र आता,
उठे मन में टीस सी वो पल हरदम याद आता।
जीवन की शाम अब सिमटा सा नज़र आता है,
बचपन की यादें कभी मीठी सी लोरी सुनाता है।
वक्त की साए में बचपन की यादों में जंग लग गई,
नयनों में सजाए पल को दिल में संजोए रहता है।
ध्यान से देखिए तो नज़र आएगा खोखला पन,
दिन भर के शोर के बाद अंजान अजनबी पन।
ज़िन्दगी के इस सफर में कई अवरोध उत्पन्न हुए,
छूटे हाथ की टीस सी खिसककर चूरा लूँ अपनापन।
अपनेपन की खुशबू में सिमट लिए हैं अनमोल पल,
एक झुरझुरी सी महसूस होती स्नेह जैसे गया पिघल।
लपक कर ढूँढने लग जाना जिन्हें अब तक जाना नही,
आँखें खुली हुई है फिर भी बिखर गया हर वो कल।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




