साहित्य

मूरख को करो दूर से नमन

उदय किशोर साह

मूरखाधिराज से मत लेना कभी पंगा
दषित कर देता है    तन मन की गंगा
जग जाहिर है इनका अपना व्यवहार
विद्वजन भी इनसे जाते हैं         हार

क्रुतर्क का होते हैं ये पूरन     विद्वान
मुरख की बस्ती  का है ये ही भगवान
लुट खासोट से   बना गाँव में धनवान
जग में समझे अपने को ही      महान

सीधा इज्जत पे। करता है ये     वार
बात बात र्मे  करता रहता।   तकरार
इनको मानवता   से ना होता है प्यार
जग में इनका    अलग है एक संसार

औरों को देख      हँसता है बार बार
कुपथ का     होता है इनका विचार
मूरख दोस्त से     जुड़ता है       तार
मुर्ख की बस्ती     में इनकी जयकार

पढ़ाई लिखाई       का है ये   दुशमन
मदिरा का       करता है ये   आचमन
विचित्र होता है        में इनका जीवन
दूर से करना है        इनको      नमन

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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