साहित्य

नारी जीवन

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

नारी जीवन की व्यथा कथा सुन,
क्या कर पाओगे इसमें,
देख घिनौना दृश्य सड़क पर
कुछ भी कर पाओगे इसमें?
यही त्रासदी है इस युग की
गाल बजाते लोग सभी हैं
बाजी आती करने की कुछ,
बगल झांकते इत उत इसमें।।

सबको प्रिय यह खेल घिनौना
उनके घर की कथा नहीं है?
पांव बिवाईं फटी नहीं कभी
क्या जानें वो जो कथा कही है,
अपने मरने पर भी तो अब
कष्ट कहां होता है किसी को
यह तो कथा मदद करने की
बवाल कटा,कोई कष्ट नहीं है।।

जिस नारी से उत्पन्न सभी हम
उसकी ही करते दुर्गति ऐसी
एक वजह यह भी हो सकती
सहमें नारी,जनने में पुत्री जैसी
इसी तरह, इसे सत्य मान लें
नारी जाति की संख्या कम होगी
तब कहां से संतति वृद्धि करोगे
जब स्थिति निम्न होएगी ऐसी।।

किन के साथ वरोगे सुत को,
बिन लड़की,क्या तब पशुओं से
या फिर विवाह सम लिंगी होंगे
दिखोगे जग में दीन दुखियों से
नारी देवि स्वरूपा है, सम्मान करो सब इनका
रो रही विवश होकर के नारी
जब श्रृष्टि विनाश होएगा ऐसे
यह श्रापित होगी ऋषियों से।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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