साहित्य

संस्मरण मैंने सुभाष नेता जी सुभाष चंद्र बोस को देखा है

ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति

यह बात जनवरी 1981 की है जब मैं बस्ती में पढ़ता था और घोड़ा अस्पताल के पास अपने रिश्ते के नाना स्व. भागीरथी जायसवाल उर्फ मुनीम जी के नये मकान में रहता था l पहली जनवरी को पढ़ाई नहीं हुई, सभी एक दूसरे को अंग्रेजी नव वर्ष की बधाई दे रहे थे l गौर रेलवे-स्टेशन क्षेत्र के एक साथी राम करन तिवारी ने कहा कि चलो आज नेता जी को देखने चलते हैं l हम दस साथी उनके मार्गदर्शन में पैसेंजर ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए और जहाँ नेता जी ठहरे थे उसी बाग के सामने ट्रेन को रोका गया तथा सभी लोग उतर गए l लगभग 50 लोग उतर कर उस बाग की ओर जाने लगे l कुछ देर बाद ट्रेन चली गई l वह आम का बाग रेलवे-स्टेशन गौर से पूर्व दिशा में लगभग 2 किलोमीटर दूर तथा 300 मीटर दक्षिण दिशा में था जहाँ नेता ही आराम से लेटे हुए थे l उनको देखने के लिए दिनभर में लगभग 500 सौ लोग आये होंगे l मेल, एक्स्प्रेस तथा पैसेंजर ट्रेन रोकी जाती थी और लोग दौड़ कर जाते तथा नेता जी को देखकर लौट जाते थे l हम लोग चार घंटे वहाँ रहे तथा शाम को उसी ट्रेन से वापस बस्ती लौट आये l
वहाँ सभी दर्शकों ने एकमत होकर कहा कि वास्तव में यह नेता जी ही हैं l उनके दो सेवक थे जो दिनरात उनकी सेवा में लगे रहते थे वे कहते थे कि नेता जी केवल गाय का दूध पीते हैं l वहाँ पर नेता जी के नाम की पुस्तक भी देखने को मिली थी जो बंगाल से प्रकाशित थी l उसमें सफेद बाल और दाढ़ी वाले वृद्ध पुरुष को नेता जी के रूप में दर्शाया गया था l इन्हें रोटी बाबा के नाम से जाना जाता था l वे सेवक यह भी कहते थे कि आप लोग नेता जी का प्रचार-प्रसार करें l अखबारों में यह खबर नहीं पढ़ने को मिली थी l चार घंटे तक हम लोग इंतजार करते रहे कि नेता जी होश में आयेंगे तो वह बात अवश्य करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ l सेवक ने बताया कि वह जो दवा लेते हैं वह नशा करती है इसीलिए नेता जी लेटे रहते हैं l
नेता जी के जन्म दिवस 23 जनवरी को हम अधिक संख्या में उस स्थान पर फिर गये कि आज नेता जी अवश्य बोलेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ l नेता जी पहले की तरह लेटे हुए मिले l इस बार मैं तैयारी से गया था और सेवकों से पूछा कि कैसे माना जाए कि यह नेता जी हैं ? बहुत कहने पर सेवक ने उन्हें बिस्तर पर बैठा दिया और पीठ पर गोलियों के दो निशान दिखाया l मैंने कहा कि गोली लगी होती तो वह मर जाते, वह सकपका गया और बोला कि छर्रा के निशान होंगे l आज भी लोगों की भीड़ कह रही थी कि ये नेता जी ही हैं l नेता जी उस दिन भी नहीं बोले और हम लोग शाम की पैसेंजर से वापस बस्ती आ गये l
राम करन तिवारी जो उसी क्षेत्र के थे 27 जनवरी को बताये कि कल अर्थात्‌ 26 जनवरी को नेता होश में आने के बाद वहाँ उपस्थित भीड़ को सम्बोधित करते हुए गणतंत्र दिवस की बधाई दिये थे और देश की उन्नति के लिये कार्य करने को कहे थे l कुछ दिनों बाद पता चला कि नेता जी 26 जनवरी की रात में वहाँ से बस्ती आकर अधिवक्ता पांडेय जी के आवास पर गुप्त रूप से रहने लगे थे l फिर वहाँ से दक्खिन दरवाजा अस्पताल रोड पर शुक्ला जी के आवास पर गुप्त रूप से रहे l वहाँ उनकी सेवा के लिए मेरे मेंहदावल से दो किलोमीटर दूर एकला गाँव की एक विधवा माता जी उनकी सेवा में तब तक लगी रहीं जब तक नेता जी वहाँ रहे l वहाँ से स्थान बदलते हुए वह फैजाबाद के श्रीराम भवन के पीछे रहने लगे थे l
सरकारी आंकड़ों और समाचारों के अनुसार सितंबर 1986 में नेता जी का देहांत हो गया और उनकी लाश को छावनी क्षेत्र में गुप्त रूप से दाह संस्कार में बदल दिया गया l यहाँ भी प्रश्न उठाया गया कि उन्हें गुप्त रूप से क्यों आग के हवाले किया गया ? इसका उत्तर किसी के पास नहीं था l मैंने बहुत पता लगाया तो पता चला कि नेता जी अपनी योजना के अनुसार वहाँ से नैमिषारण्य चले गये और वहीं पर अंतिम साँस लिये l उनकी मृत्यु तिथि को अभी भी गुप्त रखा गया है l कहने का तात्पर्य यह है कि जनता की नजरों में नेता जी आज़ भी अमर हैं और अमर रहेंगे l
सन 1970 में पंडित जवाहरलाल नेहरू पर एक वृत्तचित्र 40 मिनट का बना था और रिलीज होने से पहले उसे इंदिरा जी ने देखा तो निर्माता से कहा था कि इसमें से दाढ़ी वाले बाबा जी को हटा दिया जाये क्योंकि यह नेता जी सुभाष चंद्र बोस हैं l निर्माता ने हार मानकर उसे हटा दिया और उसे देखने हेतु जनता के सामने भेज दिया गया था l
आज़ाद भारत में आज़ाद हिन्द फौज के लोगों ने भी नेता जी पर एक पुस्तक लिखी थी जिसमें यह लिखा हुआ था कि नेता जी जिस विमान में सवार होकर गये थे वह सुरक्षित पाया गया था और नेता जी जीवित थे l
मैंने जिस महापुरुष को देखा था वह वास्तव में नेता जी सुभाष चंद्र बोस ही थे l यदि उनको सेना वाला यूनीफॉर्म पहनाकर सिर पर टोपी लगाकर फोटो लिया जाता तो उस उम्र में भी वह सटीक चित्र ठीक वैसा ही होता जैसा हम पूर्व के प्राप्त चित्रों में देखते हैं l प्रस्तुत है एक मुक्तक…
जो गोरे शासकों से लड़ते रहे अभय l
अपने विवेक बल से अरि पर किये विजय ll
उनकी जन्म तिथि पर मिलकर लगाओ नारा –
नेता सुभाष की जय, नेता सुभाष की जय ll

ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति. संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!