
अकेले हैं तो भी कोई ग़म नहीं,
झुक के जी लें इतना भी कम नहीं।
रोटियाँ सूखी सही, मान मगर पूरा रहे,
बेइज़्ज़ती का खाते हुए करम नहीं।
भीड़ चाहे लाख सिर झुकाए दरबारों में,
सच को बेच दें, गिरा इतना ज़मीर नहीं।
जिस गली में आदमी को आदमी ना समझे,
उस गली में रखते अपने कदम नहीं।
सिर कटे पर झुक न पाए स्वाभिमान अपना,
माथे पर अपमान का कोई भी निशान नहीं।
सुन ले दुनिया कान खोलकर आज —
इज़्ज़त मिलती नहीं जहां, वहाँ ठहरते नहीं।
हम अग्नि हैं, राख नहीं, पहचान यही —
झूठ के आगे कभी झुकते नहीं!! 🔥
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




