साहित्य

संस्मरण मेरी साहित्यिक यात्रा – सुधीर श्रीवास्तव से यमराज मित्र तक

सुधीर श्रीवास्तव

विद्यार्थी जीवन में अखबार पढ़ने की आदत और कहानियां, कविता के लेखकों की तरह अपना नाम देखने का लोभ मेरी साहित्यिक यात्रा की कुंजी है। आगे चलकर थोड़ा बहुत पत्रकारिता में रुचि स्थानीय पत्र पत्रिकाओं से सीधे जुड़ाव से जानकारी और घुलने मिलने की प्रवृत्ति और स्तर के अनुरूप मिलने वाले ज्ञान, प्रोत्साहन और विकल्पों ने आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।उस समय कुछेक अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन, प्राप्त सम्मानों, कवि सम्मेलनो और कुछ वरिष्ठों ने निरंतर उत्साहित किया। लगभग १९८५ से शुरू हुई यात्रा लगभग २००० तक जारी। दुर्भाग्यवश इसके बाद इस यात्रा में कुछ परिस्थितिवश पूर्ण विराम लग गया। इसके पीछे का पूर्ण सत्य आज भी अपूर्ण है।
लेकिन २०१९ में स्वर्गीय यज्ञराम मिश्र ‘यज्ञेश’ की प्रेरक वाणी से उम्मीद की किरण एक बार फिर नजर आयी। दुर्भाग्यवश २०२० में पहली बार पक्षाघात का शिकार होने के बाद माँ शारदे की पुनः कृपा से मेरी साहित्यिक यात्रा की दूसरी पारी शुरू हुई, जो अबाध जारी है। जबकि स्वस्थ होने के बाद पुनः २०२२ में पक्षाघात का शिकार जरुर हो गया, लेकिन यात्रा जारी रही।इस बीच अनेक संस्थाओं, मंचों , पटलों पर पदाधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी निभाने की यात्रा जारी है। देश विदेश के तमाम साहित्यिक विभूतियों से जान-पहचान बढ़ती जा रही है। आनलाइन काव्य गोष्ठी, एकल लाइव, लेखन आयोजनों में सहभागिता निरंतर जारी है। इस बीच मैं लगभग २००० ( कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, लेख- आलेख, पुस्तक समीक्षा आदि विधाओं में) से ऊपर रचनाएं लिखीं, जिसमें निरंतर इजाफा हो रहा। थोड़ा बहुत छंद भी सीखने का प्रयास जारी हैं। एक ओर जहाँ कुछेक अच्छे साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ का अवसर मिला, वहीं अपने संरक्षण में भी कुछ साहित्यिक आयोजन/ पुस्तक विमोचन/कवि सम्मेलन/सम्मान समारोह भी संपन्न कराया। मेरी अपनी पाँच एकल पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सात पुस्तकें प्रकाशन की राह पर हैं। कुछेक साझा संकलनों के संपादन, सहयोगी संपादक की भूमिका निर्वाह किया। अनेकानेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका हूं। आज अपनी एक अलग पहचान है। अति-उत्साह पर अंकुश रखते हुए अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए भी मुझे खुद पर गर्व है कि जिसकी उम्मीद अगले बीस सालों में नहीं थी, उससे अधिक इन पाँच सालों में ही मुझे मिला, जो माँ शारदे, की कृपा, माता-पिता के आशीर्वाद, अनेकानेक वरिष्ठों की प्रेरणा/मार्गदर्शन/संबल और शुभचिंतकों, भाइयों, बहनों की आत्मीय स्नेहिल शुभकामनाओं का प्रतिफल मानता हूँ। किसी से अपनी तुलना करने की आदत नहीं है, लेकिन खुद को कम आँकना भी मेरी प्रवृत्ति नहीं है।
हाँ एक विशेष बात यह भी है कि मेरे पहले एकल संग्रह ‘यमराज मेरा यार’ के प्रकाशन के साथ ही यमराज मित्र की नई पहचान भी मेरे साथ चस्पा हो चुकी है।
अगर अब तक सबसे उपलब्धि की बात करूँ तो अनगिनत छोटे बड़े, अनुभवी और वरिष्ठों से मिलने वाले स्नेह आशीष मार्गदर्शन, प्रेरणा, विश्वास और सम्मान के साथ जो भरोसा है, वह मेरे लिए भारत रत्न से बड़ा है। क्योंकि अपनी शारीरिक दुश्वारियों के साथ इन सबके बिना आगे बढ़ना असंभव था। यथासंभव सैकड़ों नवोदितों का बिना किसी आभार, धन्यवाद और दिखावे के बिना मार्गदर्शन मुझे आत्म संतुष्टि देता है। दूसरी साहित्यिक यात्रा की एक और उपलब्धि मेरी ताकत बन रही है, वो है जाने अंजाने लोगों से आत्मीय रिश्ते।
लेकिन मेरा मानना है कि इन सबसे भी बड़ी बात यह है कि किसी न किसी रूप में पक्षाघात मेरी साहित्यिक यात्रा के लिए वरदान साबित हो रहा है। भले लगभग २० साल मेरी साहित्यिक यात्रा कोमा में रही हो, लेकिन उसकी भरपाई इसी पक्षाघात की बदौलत हो रही है।
आज मुझे इस बात का संतोष है कि अपनी साहित्य साधना के जरिए मैं जो कुछ भी कर पा रहा हूँ, या जो पा सका हूँ, उससे पूर्णतया संतुष्ट भी हूँ, क्योंकि भविष्य में उलझकर अपने वर्तमान को भी आशंकाओं के दलदल में नहीं फँसाना चाहता। हाँ इतना जरूर चाहता हूँ कि कम या ज्यादा, यह यात्रा जारी रहे। इसके लिए माँ शारदे की कृपा के साथ आप सभी के स्नेह आशीर्वाद सहित प्रेरणात्मकता की जरूरत है। अब तक की साहित्यिक यात्रा में जिन-जिन का किसी भी रूप में मुझे सहयोग मिला, उन सभी के प्रति नतमस्तक हूँ। यथोचित नमन वंदन के साथ…..।

सुधीर श्रीवास्तव गोण्डा उत्तर प्रदेश

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