
“रंगों के इस उत्सव में जब शब्द भी अबीर-गुलाल बन जाएँ, तब साहित्य अपना वास्तविक उत्सव मनाता है।”
दि ग्राम टुडे का फायकू होली विशेषांक सचमुच रंग, रस और रचनात्मकता का एक सजीव दस्तावेज प्रतीत होता है। यह केवल पर्व विशेष पर प्रकाशित अंक नहीं, बल्कि समकालीन साहित्यिक चेतना का बहुरंगी प्रतिबिंब है।
इस विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता और भाव-गहनता है। फागुन की मस्ती, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ और व्यंग्य की मधुर चुटकी—सभी का संतुलित समावेश इसे पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी बनाता है।
विशेष रूप से “फायकू” विधा का प्रयोग अत्यंत प्रभावकारी है। लघु आकार में व्यापक भावभूमि प्रस्तुत करने की यह शैली पाठकों को तुरंत आकर्षित करती है। कम शब्दों में अधिक अर्थ संप्रेषित करने की क्षमता इस अंक की रचनाओं को विशिष्ट बनाती है।
भाषा सरल, सरस और संप्रेषणीय है, वहीं भावों में गंभीरता और परिपक्वता स्पष्ट झलकती है। संपादन संयोजन संतुलित है तथा प्रस्तुति सौंदर्य भी प्रशंसनीय है।
यदि भविष्य में प्रत्येक रचना के साथ संक्षिप्त रचनाकार-परिचय अथवा विषय-आधारित अनुक्रमणिका को और विस्तृत किया जाए तो यह अंक और अधिक व्यवस्थित एवं शोधोपयोगी बन सकता है।
समग्रतः यह विशेषांक साहित्यिक रंगोत्सव का सुंदर उदाहरण है। यह प्रयास न केवल होली के उल्लास को शब्दों में रूपायित करता है, बल्कि साहित्यिक संवाद को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है।
साधुवाद सम्पादक मण्डल को — जिन्होंने रंगों को शब्दों में ढालकर साहित्य-साधकों के लिए एक अनुपम उपहार प्रस्तुत किया।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




